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Source: Agency
Published: Monday, October 06,2008

जनपथ राजपथ


कपिल का चुनावी मरहमजामिया नगर बाटला हाउस कांड के कई दिन बाद तक कांग्रेस का कोई बड़ा नेता उस इलाके में झांकने नहीं गया। आखिरकार, केंद्रीय विज्ञान मंत्री कपिल सिब्बल ने हिम्मत दिखाई। वहां कांग्रेस और यूपीए सरकार, खासकर गृह मंत्री शिवराज पाटिल के खिलाफ रोष उमड़ रहा था। पार्टी के कुछ स्थानीय मुस्लिम नेता भी साथ थे। अपनी सदाशयता और पार्टी की निष्पक्षता दिखाने के लिए कपिल को टीवी वालों के सामने बयान देना पड़ा। उन्होंने कहा कि जामिया नगर के लोगों के मन में उस कांड के प्रति कोई शक-सुबहा है तो उसे दूर किया जाना चाहिए। आखिर, सिब्बल ने सरकारी-लाइन से थोड़ा हटने का साहस कैसे दिखाया? बताते हैं कि परिसीमन के बाद चांदनी चौक के बदले माहौल से कपिल निराश हैं। काफी पहले ही उन्होंने दक्षिण दिल्ली से भाग्य आजमाने का मन बनाया था। लेकिन जामिया नगर कांड के बाद माहौल कांग्रेस के लिए प्रतिकूल होता जा रहा है। पर यहां के वोटर कहां जाएंगे, वे भाजपा को तो वोट देने से रहे। ऐसे में कपिल योजना के तहत अल्पसंख्यक वोटरों के घाव पर मरहम लगाने में जुटे हैं।

चैनल ने तोड़ा परिवारपूवरेत्तर के एक टीवी चैनल ने पिछले दिनों दिल्ली से भी अपनी लांिचंग की योजना बनाई। इसके मालिक हैं, एक जमाने में असरदार रहे एक राजनेता। दिल्ली में अभी चैनल शुरू भी नहीं हुआ कि साहब का परिवार टूटने लगा। मैडम एक समय पत्रकार रहीं हैं। शुरू से बहुत महत्वाकांक्षी हैं। उन्होंने देखा, इस बार ज्यादा बड़ा खेल है। सो, वह अपना बड़ा हिस्सा मानने लगीं। बीच में एक आईपीएस अफसर भी खेल खेलने लगे। मामला इतना बिगड़ा कि भाई का परिवार ही टूटने लगा। दोनों मे भयानक तनातनी है। हमारी दुआ है कि ईश्वर उन्हें सुखी और साथ रखें।

बिहार-बाढ़ पर हंगामी बुकलेट कोसी की बाढ़ पर एक पुस्तिका-बाढ़-2008-अनकही कहानी छपी है। इसके लेखक हैं-प्रमोद रंजन, मेधा पाटकर, सत्यकाम, प्रभात कुमार शांडिल्य और अष्टावक्र। पुस्तिका क्या छपी, सरकार की भौंहें तन गईं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर सत्तारूढ़ गठबंधन के सभी प्रमुख नेता पुस्तिका पर नाराजगी जाहिर कर चुके हैें। इसके मुख्य संकलनकर्ता प्रमोद रंजन से सरकार और उसके सलाहकार खासतौर पर कुपित हैं। पुस्तिका कुछ ज्यादा ही वाचाल है। पर इसकी कुछ पड़ताल ऐसी है, जिससे बाढ़ और बाढ़ पीड़ितों के प्रति सरकार के उदासीन और भेदभावपूर्ण रवैये की पोल खुलती है।

नो टू मेमोरियल प्रधानमंत्री कार्यालय को पिछले दिनों एक ज्ञापन मिला। इसमें गुजरात के दंगों में मार गए 3000 से अधिक लोगों की याद में एक स्मारक बनाने की इजाजत मांगी गई थी। आवेदकों ने कहा कि सरकार इस तरह का स्मारक बनाए या उन्हे बनाने की इजाजत दे। जाहिर है, नरेंद्र मोदी तो बनाएंगे नहीं और न ही वह इसकी इजाजत देंगे। ज्ञापन पाकर पीएमओ धर्मसंकट में पड़ गया। पीएमओ लेकिन इजाजत देता तो राज्य के अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप मान लिया जाता। धर्मसंकट का समाधान निकला-अफसरों ने सुझाया कि इस बार में कहा जाए कि मेमोरियल बनाने से वहां माहौल सुधरने की बजाय और खराब होगा। दंगा में मार गए लोगों के प्रति भला यह सच्ची श्रद्धांजलि नहीं होगी।

कैबिनेट में दो गुलदस्ते किसने लाए इस बार कैबिनेट की बैठक में दो गुलदस्ते आए। प्रधानमंत्री मनमोहन ंिसह अपने सफल विदेश दौर से लौटे थे, इसलिए उन्हे खासतौर पर यह गुलदस्ते दिए गए। बाहर के लोग तबसे अंदाज लगा रहे हैं कि वे दो वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री कौन थे?आप भी लगा लीजिए अंदाज। एक का अनुमान तो आसानी से लगा सकते हैं-गृह मंत्री शिवराज पाटिल। पर दूसरा कौन था? प्रधानमंत्री की इस बार की विदेश यात्रा की एक और खासियत थी कि इस बार मंत्रिमंडल सचिवालय को पता नहीं था कि जरूरत पड़ी तो नंबर-दो की हैसियत से कौन करगा-मंत्रिमंडल और सरकार का नेतृत्व।

मंत्री जी का बयानश्रम मंत्री आस्कर फर्नाडिस का बयान उनके लिए आफत बन गया है। उन्हें क्या पता था कि मजदूरों के हित में बयान देना उनके लिए अहितकारी हो जाएगा। उन्होंने तो यह सोचकर बयान दिया कि चुनाव सिर पर है मजदूरों की सहानुभूति मिलेगी। लेकिन हो उल्टा गया। पार्टी को मजदूरों की नहीं बल्कि उद्योगपतियों की सहानुभूति की जरुरत है। यह बात पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने जब उन्हें बताई तब माजरा समझ में आया। अब मंत्री जी क्या करें। जिन मजदूरों के हितों की बात कर रहे थे उसे अब किस रूप में कहें यह समझने वाली बात है।

गोयल की नाराजगीभाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री विजय गोयल पार्टी से नाराज नहीं हैं यह बताने के लिए कुछ न कुछ कार्यक्रम करते रहते हैं। लेकिन पार्टी को उनके काम की परवाह नहीं है। पहले प्रदेश अध्यक्ष का पद और फिर मुख्यमंत्री पद भी छिन गया। मीडिया में खबरें आई की वह पार्टी से नाराज हैं। इसको गलत साबित करने के गोयल शीला सरकार की उपलब्धियों की हवा निकालते में जुटे हैं। ताकि पार्टी को लगे कि वह नाराज नहीं हैं। लेकिन शनिवार को जब उन्होंने बुराड़ी में रैली का आयोजन किया तो न तो उसमें प्रदेश अध्यक्ष पहुंचे और न ही मुख्यमंत्री पद के उम्मींदवार। उसके बाद तो गोयल के प्रति पार्टी के वरिष्ठों की नाराजगी जग-जाहिर हो गई।

उमा की माया मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की माया अपरंपार है। अब वह उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को प्रधानमंत्री पद का बेहतर उम्मींदवार मान रही हैं। प्रदेश में भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने वाली उमा का कहना है कि अब दलित वर्ग को देश का नेतृत्व दिया जाना चाहिए। आडवाणी और राहुल की बजाय उनकी पसंद मायावती हैं। बताया जा रहा है कि मायावती की मध्य प्रदेश में कमजोर स्थिति को देखते हुए उमा ने यह नया राग छेड़ा है ताकि पिछड़े और दलित वर्ग को एक किया जा सके।

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