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अपस्ट्रीम कंपनियों पर ध्यान नहीं

किरीट पारिख कमेटी ने पेट्रो रिटेल क्षेत्र से नियंत्रण हटाने के लिए कई उपाय सुझाए हैं। इन उपायों से तेल मार्केटिंग कंपनियां- इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल), हिन्दुस्तान पेट्रोलियम (एचपी) को काफी फायदा हो सकता है। कमेटी की सिफारिशें निजी क्षेत्र की रिटेल कंपनियां रिलांयस इंडस्ट्रीज और एस्सार ऑयल को भी फायदा दे सकती हैं।

लेकिन कमेटी ने अपस्ट्रीम कंपनियां यानी ओएनजीसी, ऑयल इंडिया लिमिटेड और गेल इंडिया की दिक्कतों का नोटिस नहीं लिया है। ये कंपनियां भारी सब्सिडी बोझ से कराह रही हैं। यह स्थिति देखकर यह सवाल उठाया जा सकता है कि क्या ऊर्जा सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। मसलन, कमेटी ने केरोसिन और रसोईगैस की बिक्री से तेल मार्केटिंग कंपनियों पर पड़ रहे बोझ को कम करने के उपायों का तो समर्थन किया है लेकिन यह बोझ घटाने के लिए अपस्ट्रीम कंपनियों के राजस्व में हिस्सेदारी की सिफारिश की है। तेल और गैस की खोज किसी भी देश की ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ मानी जाती है। भारत अपनी कच्चे तेल जरूरत का 80 फीसदी आयात से पूरा करता है। आने वाले दिनों में जैसे-जैसे इकोनॉमी तरक्की करगी, तेल पर हमारी निर्भरता और बढ़ेगी। ऐसे हालात में अगर देश के भीतर तेल और गैस का उत्पादन नहीं होगा तो ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। लेकिन सरकार की गलत नीतियों की वजह से तेल और गैस खोज कंपनियों की हालत खराब है।

ओएनजीसी के प्राकृतिक गैस का उत्पादन हाल के दिनों में घटा है। पिछले कुछ साल में कंपनी ने पुराने गैस फील्ड में निवेश ही नहीं किया है। एपीएम पर गैस बेचकर, कंपनी उत्पादन लागत भी नहीं निकाल पा रही है। इसलिए पुराने गैस फील्ड में निवेश में कंपनी क्यों दिलचस्पी लेगी। बाजार निर्धारित मूल्य पर गैस बेचकर निजी कंपनियां खूब मुनाफा कमा रही हैं। यही वजह है कि तेल और गैस उत्पादन में हाल में उतरी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने गैस के सबसे बड़ी उत्पादक कंपनी ओएनजीसी को पीछे छोड़ दिया है। ओएनजीसी अब भी देश में सबसे बड़ा कच्चा तेल उत्पादक कंपनी है। लेकिन लंबे अरसे से इसके उत्पादन में बढ़ोतरी नहीं देखी जा रही है। इस बीच, इस क्षेत्र में निजी कंपनियां तेजी से घुस रही हैं।

केयर्न लिमिटेड बाड़मेर के अपने ब्लॉक से 2011 तक देश के कच्चे तेल का 20 फीसदी उत्पादन करने लगेगी। केयर्न के राजस्थान ब्लॉक में ओएनजीसी की 30 फीसदी भागीदारी है, लेकिन इससे इसको फायदा नहीं होगा। उल्टे इसे घाटा उठाना पड़ सकता है। क्योंकि ओएनजीसी को इसके बदले में केयर्न को रॉयल्टी देनी होगी। पारिख कमेटी ने केरोसिन और तेल की बिक्री से तेल मार्केटिंग कंपनियों को होने वाली अंडररिकवरी का हिसाब आयात मूल्य के आधार पर करने की सिफारिश की है। उसका कहना है कि चूंकि भारत तेल और गैस की जरूरत आयात से पूरा करता है, लिहाजा इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि ओएनजीसी ने अपनी रिफाइनरी में इसका कितना उत्पादन किया। कमेटी ने न सिर्फ रिटेल सेल बल्कि रिफाइनरी गेट पर की जाने वाली बिक्री में भी इसी फामरूले को अपनाने को कहा है।





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