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Drishtikon
Editorial Editorial वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को अगर अपना बजट भाषण तैयार करने में किसी की मदद चाहिए तो वह 24 जुलाई, 1991 की दी गई मनमोहन सिंह की बजट स्पीच का सहारा ले सकते हैं। इसके बड़े हिस्से को हूबहू उठाया जा सकता है।
निश्चय ही मनमोहन सिंह 1991 में एक क्रांतिकारी बजट पेश कर रहे थे। यह बजट भयानक राजकोषीय घाटे, आसमान पर पहुंची महंगाई दर, विदेश व्यापार के मामले में दिवालियेपन की स्थिति की पृष्ठभूमि में पेश किया जा रहा था। ब्रिक अर्थव्यवस्था के एक मजबूत देश के तौर पर भारत का बजट पेश करते समय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की भूमिका अब बेहद अहम होगी। लेकिन क्या वह एक बेहतर भूमिका पेश करने में सफल होंगे। आइए एक नजर दौड़ाते हैं मनमोहन सिंह के 1991 के बजट भाषण पर। यह देखते हैं कि इसमें से हम क्या ले सकते हैं। अपना बजट भाषण मनमोहन सिंह ने यूं शुरू किया था, नई सरकार को विरासत में ऐसी अर्थव्यवस्था मिली है, जो गहरे संकट में फंसी हुई है। प्रणब मुखर्जी इस लाइन को इस साल दोहरा सकते हैं। लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाएंगे। वह पिछली सरकार को दोष नहीं दे पाएंगे क्योंकि वह भी उन्हीं की पार्टी की थी।
मनमोहन के भाषण की अगली पंक्ति थी, हम 1990 से भारी संकट के कगार पर खड़े हैं। अप्रैल, 1991 से भी हम भारी बाहरी और भीतरी दबावों से जूझ रहे हैं। वर्ष, 1990 के मध्य से ही महंगाई दर में काफी बढ़त जारी है। देश के लोगों को दहाई अंक में महंगाई दर का सामना करना पड़ सकता है और इसका सबसे ज्यादा असर समाज के कमजोर तबके पर पड़ेगा। इस बार प्रणब मनमोहन सिंह के इस वक्तव्य को अपने बजट भाषण में इसी तरह शामिल कर सकते हैं। पिछले साल हमने महंगाई दर को दहाई अंक छूते देख लिया है और इस बार भी यह स्थिति आ सकती है।
वर्ष 1991 के बजट भाषण में प्रधानंत्री ने कहा था कि कम उत्पादकता और निवेश जैसे समष्टि अर्थशास्त्र की कुछ दिक्कतों की वजह से देश में संकट की स्थिति पैदा हुई है। पिछले कुछ साल में देश में जो निवेश हुआ है, उस पर काफी रिटर्न हासिल हुआ है। सरकारी खर्च में काफी बढ़ोतरी देखने को मिली है। ऐसी बजट सब्सिडी को खतरनाक स्तर तक बढ़ने दिया गया, जिनका कोई सामाजिक और आर्थिक असर नहीं दिख रहा है। बेचारे प्रणब। वह इस लाइन को नहीं ले सकते। हालांकि वह इस लाइन का इस्तेमाल करना चाह रहे होंगे। वह इस लाइन का इस्तेमाल कर सकते हैं और इसके लिए ग्लोबल आर्थिक संकट को दोषी ठहरा सकते हैं। सरकार कर्ज उठाने के लिए व्यापक कार्यक्रम चला रही है।
इससे सरकारी खजाने में भारी छेद हो गया है। सरकारी खजाने से लगभग चार लाख करोड़ रुपये गायब हो गए हैं। यह सारी रकम तेल, खाद्य और फर्टिलाइजर सब्सिडी में खर्च हो रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र में निवेश पर मनमोहन सिंह ने कहा था कि इस क्षेत्र में प्रबंधन ठीक नहीं है और इससे सरप्लस नहीं पैदा हो रहा है ताकि निवेश किया जा सके। प्रणब इस लाइन को अपने भाषण में ले सकते हैं लेकिन वह सार्वजनिक उपक्रमों को लेकर अपनी सरकार की दिवालिया नीतियों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। एयर इंडिया बीमार है। तेल कंपनियां सरकारी बांड जारी कर जिंदा हैं। टेलीकॉम में निजी क्षेत्र तो तरक्की कर रहे हैं लेकिन बीएसएनएल और एमटीएनएल पतन की ओर बढ़ रहे हैं। यह सूची यहीं नहीं ठहरती। वर्ष 1991 के भाषण में मनमोहन सिंह ने सार्वजनिक क्षेत्र के हालात का हवाला देते हुए कहा था कि हमें ऐसे कदम उठाने होंगे, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र विकास के इंजन के तौर पर उभर सके। उन्हें सरकारी खजाने पर बोझ बने रहने नहीं दिया जा सकता।
जाहिर है मनमोहन इस काम में नाकाम रहे। लिहाजा प्रणब को कथनी और करनी का अंतर मिटा कर इस लक्ष्य को पूरा करना चाहिए। प्रणब मुखर्जी को टेलीकॉम,मीडिया, इंश्योरेंस और रिटेल में निवेश की अड़चनों को दूर करना होगा। हमें इन सेक्टरों का अक्षमता को दूर करना होगा।
मनमोहन ने 1991 में फर्टिलाइजर के मूल्य 40 फीसदी बढ़ा दिए थे। उन्होंने कहा था, फर्टिलाइजर क्षेत्र को जो सब्सिडी दी जा रही थी, उससे यह बताने की जरूरत नहीं है कि उन्होंने इसके दाम क्यों बढ़ाए। मैं सदन का ध्यान इस बात की ओर खींचना चाहूंगा कि जुलाई, 1981 के बाद फर्टिलाइजर के मूल्य में कोई बढ़ोतरी ही नहीं हुई। अब उन्हें आगे बढ़ने की जरूरत है। सिंह सदन को बार-बार यह कहते रहे कि समय बीतता जा रहा है। हमे तदर्थ नीतियों से ऊपर उठना होगा। हमें तेजी से साहसिक फैसले करने होंगे। अगर ये कदम नहीं उठाए गए तो विकास को भारी धक्का लग सकता है। देश में मंदी छा जाएगी और गरीबों को इसका भारी बोझ ढोना पड़ेगा। आज भी हालात कुछ इसी तरह के होंगे। प्रणब मुखर्जी के लिए मनमोहन सिंह के शब्दों के इस्तेमाल का सही वक्त है।