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Drishtikon
Editorial Editorial केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने चालू वित्त वर्ष के दौरान 7.2 फीसदी विकास दर का अनुमान लगाया है। पिछले वित्त वर्ष की विकास दर 6.7 फीसदी से यह हालांकि ज्यादा है लेकिन प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के अनुमानों से यह कहीं कम है। दूसरी छमाही में 7.9 फीसदी के शानदार प्रदर्शन के बाद वित्त मंत्रालय ने 7.75 और रिजर्व बैंक ने 7.5 फीसदी की विकास दर का अनुमान लगाया था।
पिछले वित्त वर्ष की तुलना में मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान 7.2 फीसदी विकास दर का अनुमान अर्थव्यवस्था में आ रही मजबूती को ही जाहिर करता है। लेकिन वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के अनुमानों से अगर कहीं यह कम है तो इसमें कृषि उत्पादकता में आई कमी का बड़ा हाथ है।
7.2 फीसदी विकास दर को समर्थन देने में सबसे बड़ी भूमिका मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की रही है। वित्त वर्ष 2008-2009 में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर ने महज 3.2 फीसदी की वृद्धि दर हासिल की थी, लेकिन मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान इस सेक्टर ने 8.9 फीसदी की वृद्धि दर हासिल की है। खनन और खदान क्षेत्र की विकास दर भी प्रभावी है। वित्त वर्ष 2008-09 में खनन और खदान क्षेत्र में सिर्फ 1.6 फीसदी की वृद्धि दिखी थी, लेकिन मौैजूदा वित्त वर्ष में इसने 8.7 फीसदी की वृद्धि दर्ज हासिल की है। बिजली, गैस और वाटर सप्लाई ने भी असरदार रफ्तार हासिल की है।
मैन्यूफैक्चरिंग, खनन, खदान, बिजली और गैस जैसे क्षेत्र के प्रभावी प्रदर्शन से साफ हो गया है कि उद्योगों को दिया जा रहा सरकार का राहत पैकेज का असर दिख रहा है। इससे नीति निर्माताओं के एक वर्ग ने बजट में इसे वापस लेने की भूमिका बना रहा है। जबकि उद्योग जगत ने इसका जमकर विरोध किया है। उद्योग जगत का कहना है कि ऐसा करने से विकास को झटका लगेगा और बेरोजगारी में इजाफा होगा।
बहरहाल, जीडीपी विकास दर में अगर अनुमान से थोड़ी कमी दिखी है तो इसका बड़ी वजह कृषि सेक्टर के लचर प्रदर्शन से है। पिछले वित्त वर्ष यानी, 2008-2009 में कृषि उत्पादकता में 1.6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। लेकिन मौजूदा वित्त वर्ष में यह घट कर -0.2 फीसदी रह गई।
यह ठीक है कि देश में सूखे की स्थिति से कृषि पैदावार में कमी आई है। लेकिन कृषि सेक्टर के विकास को लेकर लचर नीतियां चिंता पैदा करती हैं। देश में खाद्य वस्तुओं की महंगाई 17 फीसदी से भी ज्यादा हो गई है। लेकिन लगता है नीति-निर्माता इससे कोई सबक लेने को तत्पर नहीं है।
दो दिन पहले मूल्य नियंत्रण पर प्रधानमंत्री के साथ मुख्यमंत्रियों की बैठक में भी कृषि क्षेत्र की बेहतरी के लिए कोई सार्थक पहल होती नहीं दिखी। ग्लोबल आर्थिक संकट के मद्देनजर सात फीसदी से ज्यादा वृद्धि दर को कोई खराब प्रदर्शन नहीं कहा जा सकता। लेकिन अगर हम कृषि क्षेत्र पर एक व्यापक और सार्थक नीति के साथ काम करें तो जिस नौ फीसदी विकास दर की हम बात करते हैं, उसे आसानी से हासिल कर सकते हैं। साथ ही यह यह आने वाले समय में विकास दर को एक मजबूत आधार भी देगा।