|
||||||||||
Drishtikon
Editorial Editorial देश
में गरीब और हाशिये के लोग संकट से घिरे हैं। वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण से मुट्ठी भर लोगों के पास आई समृद्धि को ही देश की तरक्की माना जाने लगा है। माना जा रहा है कि भारत और चीन अमेरिका को चुनौती देने की स्थिति में आ गए हैं और कुछ समय बाद तरक्की में उसे पछाड़ भी सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जब सीनेट में भारत और चीन का जिक्र करते हैं तो देशी विशेषज्ञों और विश्लेषकों के बयानों की तुलना में ज्यादा उत्सुकता जगती है। लेकिन क्या भारत सचमुच ऐसी आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहा है? धरातल पर गौर करें तो निराशा ही हाथ लगती है।
अजरुन सेनगुप्ता कमेटी की रिपोर्ट से यह जाहिर हो गया है भारतीय गणतंत्र में सब कुछ ठीक नहीं है। कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के 78 फीसदी लोग हर दिन 20 रुपये पर जिंदगी बसर करते हैं। लेकिन सार्वजनिक जीवन में काफी कुछ तय करने वाले सत्तारू़ढ़ भद्रलोक में ये सवाल जगह नहीं पाते। हालात इतने खराब हैं कि राष्ट्र-राज्य के महत्वपूर्ण अंग भी सचाई से मुंह मोड़ने का साहस नहीं कर पा रहे हैं। हाल में ऐसे दो मामले सामने आए हैं, जिनसे इस बात की पुष्टि हो गई।
कुछ दिनों पहले जस्टिस दलवीर भंडारी और जस्टिस के एस राधाकृष्णन की बेंच ने दिल्ली की कड़कती ठंड में फुटपाथ पर रह रहे लोगों की दिक्कतों पर गौर किया। कोर्ट ने 20 जनवरी को कहा कि इस हड्डी कंपाने वाली ठंड में हजारों लोग बेघर हैं। अखबारों की रिपोर्ट में कहा गया है रैन-बसेरों की तादाद कम कर दी गई है। लिहाजा हर किसी को ठंड से बचाने के लिए आश्रय का इंतजाम किया जाए। इस ठंड से किसी को भी परेशानी नहीं होनी चाहिए। न्यायाधीशों को पता है कि कुपोषण और भूख की वजह से ठंड ज्यादा सताती है। इस बात के पुख्ता वैज्ञानिक सबूत हैं कि तापमान कम होने के साथ बेसल मेटाबोलिज्म रेट (बीएमआर) भी गिरने लगता है। ऐसे में शरीर का तापमान बनाए रखने के लिए ज्यादा कैलोरी की जरू रत पड़ती है। सरकार के लिए गनीमत यही रही कि कोर्ट ने खाने-पीेने की चीजों में बेतहाशा मूल्य वृद्धि से बढ़ रही महंगाई की मुद्दा नहीं छुआ।
एक और महत्वपूर्ण संदर्भ में भी कोर्ट का बयान काबिलेगौर है। जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस ए के गांगुली ने पंजाब स्टेट वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन के एक कर्मचारी हरजिंदर सिंह की अपील पर एक अहम फैसला सुनाया। हरजिंदर और उनके कुछ साथियों की छंटनी कर दी गई थी। उन्होंने ऐसे मामलों में अदालतों की मानसिकता पर भी चोट की। जस्टिस सिंघवी का कहना था कि लगता है वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण का लुभावना मंत्र न्यायिक प्रक्रिया पर भी हावी होता जा रहा है। ऐसा लगता है संवैधानिक प्रक्रिया भी औद्योगिक और असंगठित कर्मचारियों की हितैषी नहीं रह गई है। जस्टिस सिंघवी ने कहा कि देश में हरजिंदर जैसे कर्मचारी बड़ी तादाद में हैं, जिन्हें नौकरी से निकाल दिया गया है और वे न्यायिक प्रक्रिया के भुल-भुलैया में फंस कर न्याय से वंचित रह जाते हैं। ऐसे मामलों में सरकारी नियोक्ताओं की ओर से दलील दी जाती है कि ऐसे कर्मचारियों की दोबारा नियुक्ति से प्रतिष्ठान की वित्तीय हालत पर भारी दबाव पड़ेगा।
जस्टिस सिंघवी ने खास तौर पर कहा कि कोर्ट ऐसी दलीलों को नामंजूर कर चुका है। ऐसी गलतियों पर सजा दी जा चुकी है। नियोक्ता ऐसे मामलों में यह नजरअंदाज कर देते हैं कि हटाए गए कर्मचारी अभी कई साल तक काम कर सकते थे। जो भी थोड़ा बहुत उन्हें पारिश्रमिक मिलता था, उससे उनकी जीविका चल रही थी।
लिहाजा ऐसे लोगों को काम से हटाना उनकी मौलिक और संवैधानिक अधिकारों का भी हनन है। इस तरह के कदम से सामाजिक और आर्थिक न्याय पाने का उनका सपना अधूरा रह जाता है। समानता के अधिकार का हनन होता है और संविधान में निहित स्वतंत्रता दूर चली जाती है। जस्टिस गांगुली ने कम स्पष्ट तरीके से अदालत का रुख नहीं रखा। उनका कहना था कि देश में हजारों की संख्या में किसानों की आत्महत्या और आतंकवाद का उभार, दोनों खतरनाक संकेत पैदा करते हैं। सामाजिक न्याय हमारे संविधान का अविभाज्य तत्व है।
यह हमारे संविधान के मूल्य में निहित है। संवधिान आम अदमी की गरिमा की रक्षा की गारंटी देता है। लिहाजा यह समय सामूहिक तौर पर अपने अंदर झांकने का है। देश में बड़ी तादाद में लोग निराश होते जा रहे हैं और यह भारी मुसीबत का सबब बन सकता है। समय रहते इस तरह की विस्फोटक स्थिति को नहीं संभाला गया तो कुछ ऐसी समस्याएं खड़ी होंगी जिनका समाधान आसान नहीं होगा।