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Drishtikon
Editorial Editorial महंगाई नियंत्रण पर प्रधानमंत्री के साथ मुख्यमंत्रियों की बैठक में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के मौजूदा ढांचे में परिवर्तन के लिए 11 सदस्यों की टीम गठित कर दी गई। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत समाज के कमजोर वर्गो को राशन मुहैया कराया जाता है। देश में खाने-पीने की चीजों की महंगाई में जिस तेजी से इजाफा हो रहा है, उससे इस वर्ग के सामने भारी खाद्य असुरक्षा पैदा हो गई है। 23 जनवरी को खत्म हुए सप्ताह के दौरान खाद्य पदार्थो की महंगाई दर बढ़ कर 17.56 फीसदी हो गई। आखिर इसकी सबसे ज्यादा मार किस वर्ग पर पड़ेगी। जाहिर है गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले लोगों पर।
पीडीएस पर मनमोहन सरकार की यह चिंता आश्चर्य पैदा करती है। क्योंकि उदारीकरण के पैरोकार लगातार पीडीएस जैसी व्यवस्था को खत्म करने के पक्ष में रहे हैं। उनका कहना है सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत खाद्य पदार्थो पर भारी सब्सिडी देनी पड़ती है। लेकिन भ्रष्टाचार की वजह से यह खाद्यान्न बिकने के लिए खुले बाजार में पहुंच जाता है। अब जबकि प्रधानमंत्री ने पीडीएस को मजबूत करने का कदम उठाने की अपील की है तो यह मानना पड़ेगा कि इसकी उपयोगिता बनी हुई है। इसीलिए उन्होंने मुख्यमंत्रियों से पीडीएस की खामियों के दूर करने के उपाय करने को कहा। मनमोहन सिंह राज्यों को आवश्यक वस्तु अधिनियम के प्रावधानों का प्रभावी इस्तेमाल पर जोर देने को कह रहे हैं। यह ठीक है प्रधानमंत्री को समाज के सबसे कमजोर वर्ग की खाद्य सुरक्षा की चिंता है लेकिन सिर्फ पीडीएस के जरिये उन्हें खाद्यान्न उपलब्ध नहीं कराया जा सकता।
दरअसल इस समस्या को व्यापक दायरे में सुलझाने की जरूरत है। खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़ाने में सरकार को कोई मोर्चे पर जबरदस्त होमवर्क करने की जरूरत है। पहली जरूरत, समर्थन मूल्य पर कोई संतुलित नीति बनाने की है। गेहूं और चावल पर लगातार ज्यादा समर्थन मूल्य मिल रहा है और इससे बाजार में उपभोक्ताओं को ज्यादा दाम पर खाद्यान्न खरीदना पड़ रहा है। आयात नीति के संदर्भ में भी सोच-समझ कर कदम उठाने की जरूरत है। हम आयात करने की अनुमति तब देते हैं, जब हालात बेकाबू हो जाते हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमोडिटी के दाम और बढ़ जाते हैं। समर्थन मूल्य पर ध्यान देने की तुलना में ज्यादा जरूरी है कृषि उत्पादकता में बढ़ोतरी करना।
पिछले कुछ साल में कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर पर नहीं के बराबर खर्च हुआ है। किसी बड़ी सिंचाई परियोजना की घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में सप्लाई के मोर्चे पर लगातार दबाव बना रहता है। एक और बड़ा सुधार खेत से बाजार तक कृषि उत्पादकता में जारी मूल्य विसंगति के मोर्चे पर होना चाहिए। हाल के दिनों में बिचौलियों और मुनाफाखोरों के असर को कम करने में सरकार बिल्कुल नाकाम रही है। बहरहाल महंगाई के मोर्चे पर अगर सरकार को जीत हासिल करनी है तो उसे खाद्य उत्पादकता, वितरण और उपलब्धता तीनों मोर्चे पर मजबूत कदम उठाने होंगे। इसके बिना मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक करने का कोई सार्थक नतीजा नहीं निकलने वाला।