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बेहद घातक है रिजर्व का बढ़ता बुलबुला

पूरे एशिया में करंसी रिजर्व बढ़ता जा रहा है। भारत और चीन, दोनों के पास रिजर्व करंसी है। इस तरह पूरे एशिया में रिजर्व करंसी का एक बुलबुला बन रहा है। हम सभी को इस मौद्रिक हथियार की होड़ को एक ताकत का स्त्रोत मानना छोड़ देना चाहिए। हाल के दिनों में नीतियां तय करने में इसका इस्तेमाल कम हो रहा है। इसकी तुलना में यह बढ़ती हुई जिम्मेदारी बनती जा रही है। इसकी तीन वजहें तो मैं गिना ही सकता हूं।
पहली वजह है इसका विशाल आकार। इसकी पिरामिड स्कीम का दायरा बढ़ता जा रहा है। करंसी रिजर्व का बुलबुला भौंडेपन के एक नए दौर में पहुंच गया है। कुछ दिनों पहले बाजार में यह चर्चा गर्म थी संकट में ग्रीस ने चीन से बेलआउट पैकेज मांगा है। ऐसा लगता है देश की इकोनॉमी की बोली लग रही है। अगर ऐसा हो तो चीन पिछले साल के अपने 453 अरब डॉलर के रिजर्व से ग्रीस और वियतनाम की अर्थव्यवस्था खरीद सकता है। इसके बाद भी इसके पास मंगोलिया की अर्थव्यवस्था खरीदने लायक रकम बच जाएगी।



चीन का बढ़ता रिजर्व दुनिया भर में उसका असर बढ़ा रहा है। ज्यादा करंसी रिजर्व एक समस्या पैदा करती है और यह चीन की खुद की खड़ी की हुई है। जैसे-जैसे चीन और दूसरे देश अमेरिकी बांड खरीद रहे हैं, उनके लिए इसे भुनाना मुश्किल होता जा रहा है। अगर वे इसे भुनाने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें भारी घाटा उठाना पड़ेगा। इस डर से और ज्यादा से ज्यादा बांड खरीदे जा रहे हैं। रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड के लंदन स्थित विश्लेषक डेविड साइमंड्स का कहना है कि इन दिनों विदेशी मुद्रा के ऐसे कारोबार बढ़ते जा रहे हैं। इस तरह का रिजर्व का बढ़ना इतिहास में पहली बार हो रहा है। चीन अमेरिका के ट्रेजरी बिल और बांड को दूसरी परिसंपत्तियों और कमोडिटी में डायवर्सिफाई करना चाहता है। आखिरकार चीन के रिजर्व को सोखने की क्षमता किसमें है? सोना में, तेल में या यूरो क्षेत्र के ऋण पत्रो में। इस सिलसिले में चीन की चुनौती कुछ इसी तरह से है जैसे कोई एयरबस-320 को वॉक्सवैगन के गैराज में पार्क करने का कोशिश कर रहा हो। हर पिरामिड स्कीम में इस तरह की समस्या से निकलना मुश्किल होता है। ऐसे में अगर डॉलर ध्वस्त हुआ तो यह अमेरिकी वित्तीय संकट से भी तबाही मचाएगी।



रिजर्व के बार में इसमें कोई शक नहीं है कि इसे मृत रकम माना जाता है। दरअसल रिजर्व जमा करने का चलन 1997 में मची भारी वित्तीय अराजकता के बाद शुरू हुआ। उस समय सट्टेबाजों ने यह अंदाजा लगा लिया था कि थाईलैंड के पास काफी कम रिजर्व है और वे बिल्कुल सही थे। इसके बाद थाई बहत पर हमले से एशियाई अर्थव्यवस्था में तबाही मच गई। सरकारें अब इस तरह की गलतियां करने से बचती रही हैं। इस समय एशियाई अर्थव्यवस्था में काफी अच्छी चीजें हैं। थाईलैंड की मुद्रा के अवमूल्यन के दस साल के मौके पर एशियन डेवलपमेंट बैंक के प्रेसिडेंट हारूहिको कुरोदा ने कहा था कि इस क्षेत्र के लिए रिजर्व जमा करने की होड़ एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। लेकिन शायद ही किसी ने उनकी सलाह पर गौर किया।



एशियाई देशों में बढ़ते रिजर्व का इस्तेमाल इन्फ्रास्ट्रक्चर को सुधारने, शिक्षा का प्रसार करने, हेल्थकेयर और कार्बन उत्सर्जन की कटौती में हो सकता है। लेकिन रिजर्व का आवंटन इसमें नहीं हो रहा है। संसाधन का इस तरह का गलत आवंटन आश्चर्य पैदा करता है। अगर एशियाई देश इस रकम का इस्तेमाल करें तो एक काफी अच्छी तस्वीर बन सकती है। लेकिन इस रिजर्व से ओवरहीटिंग की समस्या भी पैदा हो सकती है। जब डॉलर खरीदा जाता है तो स्थानीय मुद्रा बेचनी पड़ती है। इससे डॉलर की उपलब्धता और सप्लाई बढ़ जाती है। अगले दिन इस अतिरिक्त तरलता को कम क रने के लिए बांड बेचना पड़ता है। इससे महंगाई बढ़ जाती है।



रिजर्व बढ़ने के जोखिम बढ़ते जा रहे हैं। एशिया में यह जोखिम महंगाई की तरफ बढ़ रहा है। अब ज्यादा ध्यान इस बात पर देना होगा, इस स्थिति को रिवर्स मैनेजमेंट के जरिये कैसे संभाला जाए। अब सारा ध्यान इस बात पर केंद्रित है क्या केंद्रीय बैंक ब्याज दर बढा कर अर्थव्यवस्था में मौजूद जरूरत से ज्यादा तरलता को सोखेंगे। उन्हें यह काम करना होगा लेकिन इससे अर्थव्यवस्था को झटका न लगे और राजनीतिक अस्थिरता न पैदा हो। हर देश में नीति निर्माताओं को यह डर सता रहा है कि अर्थव्यवस्था को बचाने की उनकी कोशिशें चुनौतियों को और बढ़ा ही रही हैं। एशियाई देश अपने निर्यात को बढ़ाने के लिए मुद्रा का अवमूल्यन कर रहे हैं। इस स्थिति में जरा यह याद कीजिये कि दुबई ने ग्लोबल अर्थव्यवस्था में कैसे डर पैदा कर दिया था। चीन की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर आठ फीसदी रहने के कयास से कैसे खलबली मचती है।





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