Google
HomeDrishtikonEditorial Editorial

इस अश्लील मुनाफाखोरी पर लगाम जरूरी

[an error occurred while processing this directive]

बिजनेस भास्कर में पिछले कुछ दिनों में छपी रिपोर्टो को पढ़ने के बाद यह साफ हो जाता है कि खाने-पीने की चीजों में किस तरह जमकर मुनाफाखोरी की जा रही है। 1 फरवरी को बिजनेस भास्कर में छपी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली के थोक बाजार में हल्दी 103 रुपये से 106 रुपये प्रति किलो की दर से बेची जा रही है। लेकिन आम खरीदार तक पहुंचते-पहुंचते इसके सौ ग्राम के पैकेट का दाम 19 से 26 रुपये हो जाता है। हकीकत यह है कि पिछले दो महीने में थोक में हल्दी के दाम 25 फीसदी घटे हैं। लेकिन मुनाफाखोर फुटकर बिक्रेता इसका लाभ उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचा रहे हैं। यही हाल दालों का है। बिजनेस भास्कर में छपी आज की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली के थोक बाजार में अरहर दाल के भाव घटकर 3900 रुपये से लेकर 4500 रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंच गए हैं।



उड़द के भाव 4000-4100 रुपये, मूंग के 5600-5700 रुपये और चना दाल के 2250 से 2275 रुपये प्रति क्विंटल तक आ गए हैं। लेकिन फुटकर बाजार में अरहर दाल 80-82 रुपये, मूंग दाल 80-82 रुपये, चना दाल 38-40 रुपये और मसूर दाल 60-62 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रही है। दाम घटने के डर से आयात सौदे भी नहीं हो रहे हैं। सरकार को इस मुनाफाखोरी रोकने के लिए सख्त कदम उठाने थे लेकिन वह भी इसका फायदा उठाने में शामिल हो गई है। दिल्ली सरकार मूंग दाल 82 रुपये, अरहर 66 रुपये, मसूर दाल 55 रुपये और चना दाल 33 रुपये किलो बेच रही है।



कुछ फुटकर बिक्रेताओं का कहना है कि चूंकि उनके पास पिछला स्टॉक बचा हुआ है, इसलिए इस दाम पर दाल बेचना इसकी मजबूरी है। लेकिन यह याद रखा जाना चाहिए कि दाल जैसी खाद्य वस्तु का स्टॉक इतना नहीं होता कि खत्म ही न हो। अगर किसी फुटकर दुकानदार के पास इसका पुराना स्टॉक है तो इसमें शक नहीं कि आगे दाम और बढ़ने की उम्मीद में उसने जमाखोरी की होगी। ऐसी स्थिति में कोई कड़ा कदम क्यों नहीं उठाया जाता।



मार्केट ऑपरेटरों से यह पूछा जाना चाहिए कि किस बाजार में खाने-पीने की चीजों में 160 गुना मुनाफा वसूला जाता है। क्या साबूत दलहन से दाल बनाने के दौरान लागत इतनी बढ़ जाती है कि इसका दोगुना दाम वसूल लिया जाए। सीधे तौर पर यह सरकार की काहिली और कमजोर इच्छाशक्ति का नतीजा है। प्रधानमंत्री मूल्य नियंत्रण पर राज्य के मुख्यमंत्रियों से बैठक करने वाले हैं। बैठक में दूसरों मुद्दों के साथ अंधाधुंध मुनाफावसूली पर नियंत्रण की बात भी होनी चाहिए।



ऐसे दौर में फुटकर बिक्रेता आम ग्राहकों से जो मुनाफा वसूल ले रहे हैं उसे अश्लील मुनाफाखोरी कहना ठीक होगा। यह ठीक है कि बाजार में चीजें आपूर्ति और मांग से तय होती हैं। लेकिन जब आपूर्ति सामान्य हो तो सौ डेढ़ सौ गुना मुनाफा वसूली का कोई औचित्य नहीं बनता। क्या प्रधानमंत्री एक कदम आगे बढ़कर मुनाफाखोरी की इस अश्लील प्रवृति को रोकने की अपील करेंगे।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड:
 

Advt