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मालवी गेहूं का बुआई क्षेत्र बढ़ाने पर जोर

मालवा की अपनी पहचान मालवी गेहूं अपने क्षेत्र में ही बेगाना हो गया था। अब इसके गुणों को देखते हुए देश की आवश्यकता हो गई है कि इसकी बुआई ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रफल में की जाये। इसके लिए केन्द्र सरकार सहित राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर प्रयास शुरु कर दिये है। फिलहाल गेहूं के कुल बोये गये क्षेत्रफल में से केवल ख्क्-ख्म् फीसदी क्षेत्र में ही मालवी किस्म का गेहूं बोया जाता है। दुनिया भर में केवल मालवी गेहूं ही ऐसा है जिसके अंदर यूजी-99 रोग से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता है। आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गेहूं के इस रोग से लड़ने के लिए किस्में तैयार की जा रही है। मैक्सिको गेूहं और मक्का अनुसंधान केन्द्र के सहयोग से देश में सीरियल सिस्टम इनिशियेटिव फॉर साउथ एशिया नाम से इस किस्म पर कीनिया और भारत में प्रयोग किये जा रहे है।



इन प्रयोगों से मालवी गेहूं की यूजी-99 से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता सामने आ चुकी है। इसके अलावा मालवी गेहूं में भूरा गेरुआ और काला गेरुआ रोग से लड़ने की क्षमता भी होती है। साथ ही, कायमा और करनाल बंट नामक रोगो के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता भी इसमें होती है। इन रोगो के कारण देश में गेहूं की फसल को काफी नुकसान होता है। अपनी इन रोग प्रतिरोधी क्षमताओं के अलावा इनकी उत्पादकता भी फ्ब्-ब्क् क्विंटल प्रति हैक्टेयर की है जबकि इनकी उत्पादन क्षमता म्म्-स्त्रक् क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है। इससे साफ होता है कि उत्पादकता और रोगों से लड़ने की क्षमता दोनों को देखते हुए मालवी गेहूं देश के लिए काफी उपयोगी है। गेहूं अनुसंधान केन्द्र इंदौर के प्रमुख एस.एन.मिश्रा ने बिजनेस भास्कर को बताया कि प्रतिरोधक क्षमताओं को देखते हुए मालव किस्म के गेहूं की ज्यादा से ज्यादा बुआई करना आज की वैज्ञानिक आवश्यकता है।



आज देश में मालवी गेहूं की मालव श्री, मालवकीर्ति, मालव रत्न, मालव शक्ति और मालव क्रान्ति नाम से पांच किस्में मौजूद है। इन किस्मों को यदि दिसंबर माह में भी लगाया जाये तो ये अन्य किस्मों से ज्यादा उत्पादन देती है। फिलहाल इसकी बुआई मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड, राजस्थान के कोटा-उदयपुर, महाराष्ट्र के पूना क्षेत्र में बोई जाती है। अपने मूल स्थान मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में भी इसकी बुआई कुल क्षेत्रफल के करीब ख्म्-फ्क् फीसदी होती है। इसके गेहूं से दलिया, सूजी, पास्ता और बाटी काफी अच्छी बनती है। इसके अलावा इसमें प्रोटीन की मात्रा भी पाई जाती है। जिसके चलते इसका उपयोग फ्लोर मिल वाले काफी करते है।





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