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Drishtikon
Editorial Editorial बुरी
आत्माओं को भगाने के लिए जरदारी ने बकरों को हलाल क्या करवाया, पाक मीडिया ने उनकी ऐसी-तैसी कर दी। खोजी पत्रकारों के लिए यह पता करना चुनौती थी कि इस अंधविश्वासी मुसलमान राष्ट्रपति ने कहीं किसी हिंदू तांत्रिक का सहारा तो नहीं लिया। जरदारी के प्रवक्ता ने सफाई दी कि सदका उतारने के लिए राष्ट्रपति रोज एक बकरा हलाल करवाते हैं। लेकिन इस खबर की धार अब भोथरी होती जाएगी क्योंकि इस्लामाबाद से इस्तांबुल तक रेल चलाने की सहमति लेकर जरदारी ने एक बड़ा काम कर दिखाया है। अब उनके लिए वाहवाही की आवाजें उठने लगी हैं। जरदारी पांच दिनों के लिए तुर्की में हैं। इस समझौते पर चार देशों की शिखर बैठक में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई भी शामिल थे, जो भारत के लिए कम से कम कूटनीतिक चिंता का विषय तो है ही।
पाकिस्तानी-तुर्की के बीच कागरे ट्रेन के पीछे जरदारी का तर्क है कि इस मार्ग से हम यूरोप पहुंच रहे हैं। हम माल पहुंचाने के साथ-साथ मुसलिम देशों से भी संबंध पक्का करेंगे। समुद्री मार्ग से तुर्की तक जाने में पाक के जल जहाजों को 45 दिन का वक्त लग जाता है। पाकिस्तान को उम्मीद है कि इस रेल मार्ग के चालू हो जाने से तुर्की से 74 करोड़ 10 लाख डॉलर का सालाना व्यापार बढ़ कर दो अरब डॉलर का हो जाएगा। यह आयडिया जरदारी का ही था और पिछले 14 अगस्त से माल ट्रेन ट्रायल पर चलाई भी जा रही थी। इस समय पाकिस्तानी-तुर्की के बीच 6 हजार 566 किलोमीटर की दूरी इस ट्रायल कागरे ट्रेन से 11 दिन में पूरी हो रही है। इस रेल ट्रैक को और फास्ट बनाने के लिए तुर्की की तीन कंपनियों ने काम करना शुरू कर दिया है। पांच साल में तेज रफ्तार ट्रेन दौड़ाने लायक ट्रैक तैयार हो जाएगा, तब इस्लामाबाद से मात्र तीन दिनों में इस्तांबुल पहुंचा जा सकता है।
पाकिस्तान में यह रेल ट्रैक 1990 किलोमीटर बननी है। ईरान में 2570 किलोमीटर और तुर्की में 2006 किलोमीटर तेज रफ्तार झेलने वाली रेल लाइनें बनेंगी। शुरू में तो इस ट्रैक से मालगाड़ियां चलेंगी पर बाद में यात्री ट्रेन भी चलना तय है ताकि पर्यटन से आय हो सके।
अफगानिस्तान को बहुत महीन तरीके से जरदारी ने इस रेल प्रोजेक्ट में शामिल किया है। मूल रूप से यह रेल पाक सीमा पर स्थित चमन से ही चलनी थी। पाकिस्तान ने चमन से कंधहार तक एक और रेल मार्ग विकसित कर अफगानिस्तान को इसमें शामिल कर लिया है। क्वेटा-चमन-कंधहार लिंक रेल ट्रैक को बनाने में इस्लामाबाद, काबुल पर बड़ी दरियादिली दिखा रहा है। इससे अलग चीन, काराकोरम मार्ग से पाकिस्तान के लिए रेल लगा रहा है, जो ग्वादर बंदरगाह तक जाएगा। चीन एक दूसरा रेल मार्ग अफगानिस्तान के आयनक कॉपर माइंस तक लगा रहा है ताकि वह तेजी से तांबा अयस्क उठा सके। चीन,पाक सीमा पर स्थित तुर्खम से भी अफगानिस्तान के जलालाबाद को रेल से जोड़ रहा है। इस खनिज बहुल इलाके का वह व्यापारिक दोहन कर सकेगा।
देखा-देखी नाटो वाले भी दो रेल लाइनें बनवा रहे हैं। एक रेल ट्रैक ताजिकिस्तान बॉर्डर, खोरगन टेपे से दक्षिणी अफगानिस्तान के निझनी प्यंझ को जोड़ेगा, जिसे अमेरिका बना रहा है। दूसरा ईरान की राजधानी तेहरान से अफगान शहर हेरात के लिए रेल और राजमार्ग जर्मनी बना रहा है। कहा यही कहा गया है इस रेल-रोड का इस्तेमाल असैनिक साजो-सामान ढोने के लिए होगा। पश्चिम को गाली देने वाला ईरान नाटो की क्यों परोक्ष तौर पर मदद कर रहा है, यह नए सिरे से सोचने वाली बात है। एक बात जरूर है कि इलाके में आतंक का विध्वंस हो रहा है तो इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भी काम भी हो रहा है, भले ही इसकी नीयत निहित स्वार्थ वाले देशों तक ही सीमित क्यों न हो। पाकिस्तान और तुर्की चाहते तो भारत को इसमें शामिल कर सकते थे। इससे पूरे क्षेत्र का ढांचागत परिदृश्य ही बदल सकता था। यूरोप के देशों में रेल रोड और तेल-गैस लाइनों के जुड़ने से एक साझा ढांचागत सुविधा खड़ी हो चुकी है।
पिछले साल अक्टूबर में तुर्की के प्रधानमंत्री रिसेप तैयप एदरेआन के इस्लामाबाद आने पर ही इसका ब्लूप्रिंट बन गया था कि पाक से 200 अरब डॉलर के व्यापार को अमली जामा कैसे पहनाया जाए। इस्तांबुल इस समय इकोनॉमिक कॉरपोरेशन ऑर्गेनाइजेशन-ईसीओ की पांच दिन की शिखर बैठक में व्यस्त है। ईसीओ में अजरबैजान, उज्बेकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कजाकस्तान, किरगिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्केमेनिस्तान, तुर्की जैसे दक्षिण और मध्य एशिया के 10 देश हैं। पाकिस्तान इस मंच का भरपूर इस्तेमाल अफगानिस्तान पर दबाव बनाने के लिए कर रहा है, ताकि करजई किसी तरह भारत के प्रभामंडल से निकल आएं। इस बैठक में तेल-गैस पाइपलाइनों के विस्तार पर बड़ी गंभीरता से बात हो रही है। पर भारत सीन में दूर-दूर तक नहीं है।