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में गरीबों की तादाद कितनी है? भारत जैसे देश, जो आंकड़े हासिल करने में दक्ष हैं और जहां इस पर अकादमिक काम भी खूब हो रहा है, वहां इसकी सही-सही तादाद जानना कठिन काम नहीं है।
अजरुन सेनगुप्ता कमेटी रिपोर्ट के मुताबिक देश के 77 फीसदी लोग गरीब हैं। एनसी सक्सेना कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक देश की आधी आबादी गरीबी है। विश्व बैंक के मुताबिक इस देश के 41.6 फीसदी लोग गरीब हैं। ताजा आंकड़ा सुरेश तेंदुलकर कमेटी ने पेश किए हैं। इस कमेटी में कई विशेषज्ञ थे। इसने गरीबी के आकलन के तौर-तरीके की भी समीक्षा की है। इस कमेटी के मुताबिक वर्ष 2004-05 में गरीबी 37.5 फीसदी हो गई। जबकि सरकारी आकलन 27.5 फीसदी का था। ग्रामीण क्षेत्र में बेरोजगारी 41.8 फीसदी थी, जबकि सरकारी आकलन 28.3 फीसदी था। राष्ट्रीय स्तर पर शहरी गरीबी 25.7 फीसदी ही रही। सरकारी आकलन भी इसके करीब ही था।
आखिर गरीबी के आकलन में इतनी भ्रम की स्थिति क्यों है? दरअसल हम जब अलग-अलग तरीके से गरीबी का आकलन करते हैं तो गरीबों की तादाद बदलने की बजाय गरीबी की परिभाषा और इसके पैमाने बदल जाते हैं। गरीबी आंकने के लिए किसी भी पैमाने पर गौर करने से पहले किसी भी परिवार में आय और उपभोग के अनुपात पर गौर करना होगा। वह रेखा भी खींचनी होगी, जो गरीबों और गैर गरीबों के बीच अंतर करेगी। जहां तक उपभोग पर खर्च करने का मामला है तो इस सिलसिले में नेशनल सैंपल सर्वे संगठन के आंकड़ों का ही सहारा है। हालांकि अब भी सटीक गरीबी रेखा की पहचान समस्या बनी हुई है। गरीबी रेखा कोई अमूर्त या ऐच्छिक पैमाना नहीं है। इसे जीवनयापन के लिए जरूरी खर्च करने की क्षमता को मौद्रिक पैमाने पर तौल कर निर्धारित किया जा सकता है।
यहीं पर हमारा तरीका अलग-अलग हो जाता है। गरीबी रेखा को देखने के अलग-अलग नजरिये की वजह से ही गरीबी के आक लन में दिक्कतें आ सकती हैं। इस प्रक्रिया में एक अहम पहलू तो यह है कि हर राज्य में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में गरीबी रेखा का पैमाना एक हो। आप जिसे भी गरीबी रेखा मानें, उसे हर जगह लागू करें। गरीबी रेखा के आकलन के दौरान वस्तुओं के मूल्य के अंतर को एक महत्वपूर्ण एडजस्टमेंट के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए। सुरेश तेंदुलकर कमेटी से पहले की सारी कमेटियों ने इस पहलू को नजरअंदाज किया था।
उदाहरण के लिए अजरुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट ने प्रति दिन 20 रुपये की आय को गरीबी रेखा मान लिया था। दुर्भाग्य से 20 रुपये को पैमाना बनाने के पीछे कोई आधार नहीं था। हालांकि यह संयोग ही है कि तेंदुलकर कमेटी ने भी शहरी क्षेत्र में 19 रुपये 30 पैसे की प्रति दिन की कमाई को गरीबी रेखा माना है। यही वजह है कि अजरुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट के मुताबिक 77 फीसदी गरीबी की तुलना में तेंदुलकर कमेटी ने 37 फीसदी गरीबी का आंकड़ा पेश किया है।