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Drishtikon
Editorial Editorial पांच
साल पहले मैं उत्तर प्रदेश के मेरठ कॉलेज में राजेश नाम के छात्र से मिला था। राजेश तीसवें साल में था और पिछले 13 साल से पढ़ाई कर रहा था। मेरठ में लंबे समय से पढ़ाई कर रहे दूसरे कई छात्रों की तरह वह भी खुद को बेरोजगार बता रहा था और किसी सही नौकरी की तलाश में था।
मेरठ क्या पूरे उत्तर भारत में आपको मेरठ के छात्र जैसे ही लोग मिल जाएंगे। भारत की तकनीकी विशेषज्ञ की छवि में छिपी यह एक हताश करने वाली तस्वीर है। यह तस्वीर भारत की नहीं है। एशिया, अफ्रीका और लातीन अमेरिका, तीनों जगह अच्छी पढ़ाई-लिखाई करने वाले छात्र-छात्राओं की खासी तादाद है। लेकिन उनके पास रोजगार नहीं है।
इस वजह की पहचान मुश्किल नहीं है। शिक्षा के बढ़ते स्तर ने दुनिया भर में उम्मीदों को हवा दे दी है। लेकिन दुनिया भर के देशों में सरकारों ने सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में कटौती की है। ये क्षेत्र शिक्षित युवाओं का एक बड़ा सहारा थे। डिग्री लेकर निकलने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है रोजगार कम होते जा रहे हैं।
पिछले 15 साल से मैं उत्तर प्रदेश में शिक्षित बेरोजगारों की समस्याओं पर रिसर्च कर रहा हूं। 19 करोड़ लोगों वाले इस सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य में इस रिसर्च को इकोनॉमिक एंड सोशल रिसर्च काउंसिल फंड करती है। उत्तर प्रदेश में लाखों माता-पिता की माली हालत ऐसी है कि वे अपने बच्चों को आसानी से स्कूल या यूनिवर्सिटी में पढ़ा सकते हैं। लेकिन स्कूलों और कॉलेजों से निकलने वाले छात्रों को बंधी-बंधाई वेतन वाली नौकरी मिलने में दिक्कत आती है।
राज्य में युवा बेरोजगारों की तादाद बढ़ती जा रही है। मेरठ में एक सरकारी पद के लिए लगभग दस हजार आवेदन आते हैं। मेरठ के छात्रों का कहना है कि सरकारी नौकरी पाने के लिए सोर्स और फोर्स (रिश्वत देने की क्षमता) की जरूरत पड़ती है। शिक्षा के स्तर में गिरावट की वजह से भी युवाओं में गुस्सा बढ़ता जा रहा है। उच्च शिक्षा में निवेश की कमी और बढ़ते भ्रष्टाचार की वजह से कई यूनिवर्सिटी की डिग्रियों का महत्व कम हो गया है। वर्ष 2006 में मेरठ की एक नामी यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार ने मास्टर डिग्री के स्टूडेंट्स की कॉपियों को बच्चों से जंचवाने के लिए भेज दिया था। इनमें से तो कुछ बच्चे आठ साल की उम्र के थे। इससे नाराज छात्रों ने सड़कों पर अपनी डिग्रियां जला दी थीं।
मेरठ के कुछ छात्रों ने रेगुलर वेतन वाली नौकरियां पाने की आस छोड़ दी है। कई छात्र खेती-किसानी और शारीरिक श्रम से जुड़े पेशे में घुस गए हैं। एमए और पीएचडी करके कई छात्र खेतों में काम कर रहे हैं। राजेश जैसे कु छ छात्र लगातार यूनिवर्सिटी में बने रह कर डिग्रियां जमा करते हुए बेरोजगारी को थोड़ी दूर रखे हुए हैं। उन्हें उम्मीद है कि कभी न कभी उन्हें नौकरी मिलेगी।
परिवार और परिवार से बाहर समाज और राजनीति में बड़े पैमाने पर फैली इस बेरोजगारी का असर देखा जा सकता है। परिवारों में जब मैं जाता हूं तो बताया जाता है कि किस तरह मां-बाप अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए दिक्कतें झेलते आए हैं और अब बच्चों का बेरोजगार होना उन्हें कितना साल रहा है। कई घरों में युवतियां खेतों में काम कर रही हैं ताकि उनका भाई पढ़ता रहे।
राजनीतिक अस्थिरता में भी यह बेरोजगारी भूमिका अदा करती है। अक्सर इस तरह के बेरोजगार युवक सिविल सोसाइटी के लिए खतरा बन जाते हैं। अपनी रिसर्च के दौरान मैंने छात्रों से बातचीत में पाया कि इस शहर में हुए कई दंगों में शिक्षित बेरोजगार शामिल रहे थे। नब्बे के दशक में हुई कई हिंसक घटनाओं में इनके शामिल होने के सबूत हैं। हालांकि कुछ युवा खाली वक्त और अपने कौशल का इस्तेमाल कथित सामाजिक सुधारक बन कर रहे हैं।
कुछ छात्रों ने राजनीति से कमाना शुरू कर दिया है। वे फिक्सर का काम करने लगे हैं। इन्हें पता है कि राजनीतिक सिस्टम कैसे काम करता है। इसलिए वे निजी यूनिवर्सिटी की सीट बेचते हैं। सरकारी अधिकारियों से रिश्वत लेते हैं और कारोबारियों को ठेके दिलाने में मदद करते हैं। ये युवा ऐसे भ्रष्टाचार को बढ़ाने के क्रम में हिंसा का भी सहारा लेते हैं। भारत में पढ़े-लिखे लोगों के बीच बेरोजगारी के दो चेहरे हैं। इस देश के दूर-दराज इलाकों में कुछ युवा सामाजिक हितों के उद्देश्य से प्रेरित होकर कल्याणकारी कामों में जुटे हैं। लेकिन कुछ युवा बेरोजगारी से परेशान होकर गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं।
भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को ऐसे छात्रों की ऊर्जा को एक दिशा देने के लिए आगे आना चाहिए, जो देश के अलग-अलग कोनों में सामाजिक काम कर रहे हैं। हालांकि यह समय पूरी दुनिया में इस तरह के शिक्षित बेरोजगारों की समस्या की ओर ध्यान देने का भी है।