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Drishtikon
Editorial Editorial अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने संसद में संबोधन के दौरान आउटसोर्सिग करने वाली कंपनियों को मिलने वाली टैक्स छूट में कटौती का जो ऐलान किया है, उससे भारतीय कंपनियों का चिंतित होना लाजिमी है। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि आउटसोर्सिग करने वाली कंपनियों की टैक्स छूट खत्म करने और देश में रोजगार पैदा करने वालों की मदद करने का समय आ गया है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ इन कदमों से दो साल में 70 लाख नौकरियों में कटौती की क्षतिपूर्ति नहीं होगी। दो साल पहले शुरू हुए आर्थिक संकट की वजह से अमेरिका में बेरोजगारी दस फीसदी तक पहुंच चुकी है।
ऐसे में उन्हें इस तरह का कदम उठाना ही था। अपने चुनाव प्रचार के दौरान और फिर बाद में भी उन्होंने इस तरह के कदम उठाने के संकेत दिए थे। उस समय आउटसोर्सिग करने वाली कंपनियों को मिल रही टैक्स छूट बंद करने का विरोध हुआ था। आउटसोर्सिग के प्रमुख बाजार भारत और फिलीपिंस जैसे देशों ने इसका जमकर विरोध किया था। लेकिन दो साल बाद एक बार फिर आउटसोर्सिग को हतोत्साहित करने वाले कदम उठाकर उन्होंने भारत और फिलीपिंस जैसे देशों की कंपनियों के लिए चिंता पैदा कर दी है। लेकिन क्या इन देशों की कंपनियों के लिए यह वाकई चिंता की बात है? यह ठीक है कि अमेरिकी आउटसोर्सिग से लाभ हासिल करने वाला भारत एक बड़ा बाजार है। लेकिन क्या अमेरिकी कर्मचारी आईटी और नॉलेज इकोनॉमी से जुड़े दूसरे कारोबार में भारतीय दक्षता का मुकाबला कर पाएंगे। क्या अमेरिकी कंपनियां अपने यहां काम कराके लागत पर नियंत्रण लगा सकेंगी? क्या भारत और आउटसोर्सिग सेवा देने वाले इसके जैसे दूसरे देशों को अमेरिका के बाहर भी बड़ा बाजार खोजने की कोशिश शुरू नहीं कर देनी चाहिए?
अमेरिकी विश्वविद्यालय और स्कूलों में जिस तरह गणित और विज्ञान के स्टूडेंट्स की कमी दिख रही है, उससे खुद ओबामा चिंतित हैं। उपलब्धि हासिल करने की दौड़ में अमेरिकी युवा इन देशों के विद्यार्थियों से पीछे होते जा रहे हैं। अमेरिकी विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में अब ज्यादा पेटेंट चीनी और भारतीय छात्रों के हैं। इसलिए जब तक अमेरिकी युवा भारतीय, फिलीपिनी या फिर चीनी युवाओं की तरह दक्षता हासिल नहीं करेंगे, उन्हें वो नौकरियां नहीं मिल पाएंगी जो अमेरिका से बाहर जा रही हैं।
हालांकि यह भारत जैसे देशों के लिए भी एक चेतावनी है क्योंकि आने वाले दिनों में उसके बाजार के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ने वाली है।अमेरिका अपने यहां की नौकरी को बाहर जाने से बचाने की पूरी कोशिश करेगा। इस बार के अमेरिकी बजट में विज्ञान और तकनीक की पढ़ाई के लिए ज्यादा आवंटन इस बात की निशानी है कि अमेरिका चुनौती का सामना करने को तैयार है। यहीं भारत को एक और मोर्चे पर ध्यान देना होगा। इसे अमेरिका से इतर यूरोप, अफ्रीका और लातिन अमेरिकी देशों में भी अपने बाजार की तलाश करनी होगी।