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Drishtikon
Emotional Development Emotional Development बजट
से पहले आर्थिक नीति-निर्माताओं के बीच विचार-विमर्श का दौर शुरू हो चुका है। दो सवालों पर जमकर बहस हो रही है। क्या महंगाई को कम करने के लिए मुद्रा प्रवाह पर रोक लगाई जानी चाहिए। क्या उद्योगों को दिए जाने वाले राहत पैकेजों को समेटने का समय आ गया है। अगर इन पैकेजों को समेट लेंगे तो क्या विकास दर पर इसका असर नहीं पड़ेगा। ऐसी ही स्थिति थी जब जब राजीव गांधी पहली बार सत्ता में आए थे। भुगतान संतुलन की स्थिति बेहद खराब थी और सूखे और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के बढ़े हुए दाम की वजह से अर्थव्यवस्था बेहद दबाव में थी। हां, उस दौैर और आज की स्थिति एक भारी अंतर था। उस समय हमारे पास विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति बेहद खराब थी। लेकिन आज हमारे विदेशी मुद्रा कोष की हालत मजबूत है। हम महंगाई कम करने के लिए खाद्यान्न आयात कर सकते हैं। खाद्यान्न और तेल आयात के लिए हमें बाहरी कर्ज पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
इस समय मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बासु ऊंची वृद्धि दर के पक्ष में हैं। इसलिए योजना आयोग ज्यादा बजटीय समर्थन की मांग कर रहा है। गैर नियोजित खर्चो को घटाने के बाद बची वो रकम बजटीय समर्थन कहलाती है, जो नियोजित निवेश को सहारा देती है। मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बासु और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयान से तो ऐसा लगता है कि वे ऊंची विकास दर के पक्ष में हैं।
यहां इस बात पर भी गौर करना जरूरी है कि सिर्फ बजटीय समर्थन बढ़ाने से ही विकास दर को रफ्तार नहीं मिलेगी। इसके लिए कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्यवन पर भी ध्यान देना होगा। योजना आयोग विभिन्न मंत्रालयों और सार्वजनिक क्षेत्रों और राज्य सरकारों को फंड मुहैया कराता है। कार्यक्रमों के बेहतर क्रियान्यवन की काफी जरूरत है। ज्यादा फंड की मांग तभी सार्थक होगी, जब कार्यक्रमों को बेहतर तरीके से लागू किया जाए। नरेगा जैसे बड़े कार्यक्रम में सुधार की पूरी गुंजाइश है। अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार इस बात पर ही निर्भर है कि बाकी सेक्टर कितना साथ देते हैं।
अगर पूरी अर्थव्यवस्था का विकास चाहिए तो इसके हर अंग को साथ-साथ चलना होगा। प्रतिस्पर्धा में बढ़ोतरी, राजकोषीय स्थिरता और ऊंची उत्पादकता, तीनों चाहिए। निजी क्षेत्र ने इसका उदाहरण पेश कर दिया है। फंड उगाहने और उसे लाभ के लिए इस्तेमाल की काबिलियत यह दिखा चुका है। नैनो का उदाहरण सबके सामने है। विनिमय दर से जुड़ी नीति भी बड़ी भूमिका अदा करेगी। चीन में अपनी मुद्रा का मूल्य घटाया हुआ है। दूसरी ओर यह मैन्यूफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में उत्पादकता बढ़ा कर पूरी दुनिया के बाजार में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की मजबूती से भी चीन का फायदा पहुंचा है। भारत को इन्हीं उदाहरणों से सबक लेना चाहिए। भारत को तेज विकास दर हासिल करना है तो कृषि क्षेत्र में सप्लाई के मोर्चे पर काफी मशक्कत करने की जरूरत है। उम्मीद है बजट में इन मुद्दों का ख्याल रखा जाएगा।