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तरक्की चाहिए तो बदलने होंगे तरीके

चीन से गूगल की विदाई की खबरों के बीच लोग एक संभावित विजेता की ओर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। यह विजेता है भारत।
अगर भारत और चीन के बीच आर्थिक तरक्की पर बात करें तो पाएंगे कि चौथी तिमाही में चीन की 10.7 फीसदी की विकास दर भारत की 6.5 फीसदी की विकास दर से बेहद ज्यादा है। निश्चित तौर पर यह दावोस की बैठक में प्रतिनिधियों के बीच बातचीत का पसंदीदा मुद्दा होगा।



चीन की अर्थव्यवस्था निश्चित तौर पर कुलांचे भर रही हैं और जो लोग इसके विकास की नकारात्मक बातें कह कर पैसा कमाना चाह रहे होंगे उन्हें निराशा ही हाथ लगी होगी। लेकिन क्या वास्तव में चीन की अर्थव्यवस्था 2010 में बुरे दिन देख सकती है? ऐसा हो सकता है। गूगल को अपने यहां से विदाई देकर वह ऐसी गलतियों का सिलसिला शुरू कर सकता है। हालांकि रातोंरात चीन की अर्थव्यवस्था के बुरे दिन देखने की हसरत रखने वालों की इच्छा पूरी नहीं होगी। चीन अपनी आर्थिक तरक्की के उफान पर है। जबकि भारत में लीलाफीताशाही का जोर है। सिस्टम में कार्यकुशलता बेहद कम है और भ्रष्टाचार का बोलबाला है। इसके बावजूद प्रयोग करने में भारत का ट्रैक रिकार्ड अच्छा है। दुनिया की बड़ी और जानी-मानी कई कंपनियों ने भारत को अपना डेरा बनाया हुआ है। बौद्धिक संपदा अधिकार और कॉरपोरेट गवर्नेस के मामले में भी भारत चीन से आगे है।



अब देखते हैं चीन की इकोनॉमी की क्या विशेषता है। सस्ता श्रम, मुद्रा की कीमत कम रखना, सरकारी कंपनियों को सब्सिडी देना और निर्यात पर लगातार जोर। चीनी अर्थव्यवस्था की प्रमुख रणनीति है। गूगल के साथ चीन के पंगा से जाहिर है कि वह अब भी इकोनॉमी के पुराने र्ढे पर चल रहा है। वह भविष्य की रणनीति नहीं अपना रहा है। कौन जानता है कि मुक्त बाजार व्यवस्था और अभिव्यक्ति पर पाबंदी का यह तरीका ही कल का सफल मॉडल हो। वह घरेलू कंपनियों को मजबूत कर रहा है। दुनिया भर में निवेश करने के लिए उसके पास 2.4 खरब डॉलर का निवेश है। लेकिन यह रणनीति लंबी अवधि में कारगर होगी, कहा नहीं जा सकता। चीन अपनी अर्थव्यवस्था पर जो खरबों युआन खर्च कर रहा है, वह आगे चलकर बहुत काम नहीं आने वाले। साइबरस्पेस और मीडिया पर लगाम लगा कर चीन अपने उद्योगपतियों और कारोबारियों की राह में अड़चनें पैदा कर रहा है।
आज का दौर शारीरिक श्रम की तुलना में मानसिक श्रम का है।



यह दौर फैक्टरी के फ्लोर पर पसीना बहाने से ज्यादा नए विचार और तकनीक आजमाने का है। सवाल यह है कि ऐसा करके चीन आज से पांच या दस साल बाद कहां पहुंचना चाहता है। दुनिया नॉलेज इकोनॉमी से संचालित हो रही है। इसलिए चीन को तरक्की हासिल करनी है तो ज्ञान की दुनिया की नई उपलब्धियों के बारे में जानना और समझना होगा। इस रणनीति के आधार पर ही वह नई तकनीक के मौकों को भुनाकर अपने लोगों का जीवनस्तर ऊंचा उठा सकेगा। चीन की बड़ी कमी है घरेलू अर्थव्यवस्था में ज्ञान और तकनीक की कोई बड़ी कंपनी न खड़ा कर पाना। मुझे लगता है यहीं भारत इससे बाजी मार ले जाएगा। भारत में नंदन नीलकणी को अक्सर माइक्रोसॉफ्ट के बिल गेट्स का भारतीय जवाब माना जाता है। तकनीक के क्षेत्र में भारत की तरक्की के बारे में वह कहते हैं कि आजाद प्रेस और ज्ञान के प्रवाह को हासिल करने की ललक की वजह से भारत तकनीक में तरक्की हासिल कर सका है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि अगर भारत साइबर स्पेस पर लगाम लगाता तो इन्फोसिस और विप्रो जैसी कंपनियां खड़ी नहीं हो पातीं।



भारत के सामने चुनौतियां हैं। कौशल के पैमाने पर वह अभी काफी नीचे है। इन्फ्रास्ट्रक्चर की हालत खराब है। निवेश की राह में अड़चने हैं। गरीबी हटाने में भारत चीन से पीछे चल रहा है। लेकिन यहीं नीलकणी जैसे साइबर विशेषज्ञों की जरूरत है। भारत में लाखों ग्रामीणों का कहना है कि भ्रष्टाचार की वजह से उन्हें पूरी मजदूरी नहीं मिलती। पोस्ट ऑफि स में जमा उनके पैसे निकाल लिये जाते हैं। अब भारत सरकार ऐसे भ्रष्टाचार को बंद करने के लिए इन्फोसिस का सहारा ले रही है। नीलकणी देश में जारी होने वाले विशिष्ट पहचान पत्र परियोजना के प्रमुख हैं। एक साल बाद नीलकणी दुनिया का सबसे बड़ा बायोमैट्रिक डाटाबेस तैयार कर सकेंगे। ताकि भारत की एक अरब 20 करोड़ की आबादी वाले देश में कोई भी व्यक्ति आईसीआईसीआई जैसे बैंक में तुरंत खाता खोल सके या फिर वोडाफोन जैसी सेल फोन सर्विस की सेवा ले सके। यह चीन की विशाल परियोजनाओं जैसी न हो लेकिन भारत में तकनीक के बादशाह सरकार के लिए ऐसी रणनीति तैयार कर रही है, जिससे विकास के लाभ का दायरा बढ़ाया जा सके।





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