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रेटिंग एजेंसियों पर ऐसी कवायदों का क्या फायदा

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क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों पर व्यापक नियमन के लिए बनी कमेटी ने भले ही इन एजेंसियों के कामकाज के तरीके और गतिविधियों को चिंताजनक नहीं माना है लेकिन कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर ध्यान देना जरूरी है। ग्लोबल वित्तीय संकट ने जिस तरह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल मचा दी, उसके बाद भारत में नीति-निर्माताओं का सावधान होना लाजिमी था। यही वजह है कि इन एजेंसियों में पारदर्शिता, वित्तीय उत्पादों की रेटिंग में उनके वर्चस्व और कार्टेलाइजेशन की प्रवृति की जांच जरूरी थी। लेकिन कई मुद्दों पर रिपोर्ट निराश ही करती है। पहला मुद्दा रेटिंग एजेंसियों की रेटिंग बिजनेस और दूसरी गतिविधियों से जुड़ा खुलासा है। दूसरा मुद्दा रेटिंग एजेंसियों की ओर से किसी वित्तीय उत्पाद को रेटिंग मिल जाने के बाद की निगरानी से जुड़ा है। कमेटी को इस बात पर गौर करना था कि आखिर रेटिंग एजेंसियों की आय का स्त्रोत क्या है? क्या रेटिंग कारोबार के अतिरिक्त उनका उन कारोबार में हिस्सेदारी है, जिनकी वे रेटिंग करती हैं। लेकिन दोनों मुद्दों पर वह फैसले लेने वाला कोई निष्कर्ष नहीं निकाल पाई है।



इस समय देश में पांच क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां हैं- क्रिसिल, इक्रा, फिच इंडिया, केयर और ब्रिकवर्क्‍स। इनमें क्रिसिल और इक्रा का मार्केट में वर्चस्व है। विश्लेषकों का मानना है दोनों रेटिंग एजेंसियों की रेटिंग में बहुत ज्यादा अंतर नहीं होता है। ऐसे में क्या कार्टलाइजेशन का खतरा नहीं हो सकता? अर्थव्यवस्था से जुड़े कई पहलुओं की रेटिंग में इन एजेंसियों की रेटिंग के आधार पर अहम फैसले लिये जाते हैं। लिहाजा पारदर्शिता की जांच जरूरी है। लेकिन कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर पूरी दुनिया में कोई फैसला नहीं लिया जा सका है। इसलिए यहां भी इस पर कोई कदम नहीं उठाया जा सका है। इस समय रेटिंग एजेंसियां उन वित्तीय उत्पादों या कंपनियों से शुल्क लेती है, जिनका वे रेटिंग करती है। कमेटी ने इसके विकल्प पर गौर किया। कमेटी के सामने यह सवाल था कि एजेंसी को पैसे वित्तीय उत्पाद या कंपनियां दें या फिर निवेशक। दोनों ही विकल्पों पर सहमति नहीं बन पाई।
ग्लोबल वित्तीय संकट के पीछे एक बड़ी वजह इनवेस्टमेंट बैंकों की गड़बड़ी रही है।



रिजर्व बैंक, सेबी, पीएफआरडीए और आईआरडीए की समन्वय समिति वाली कमेटी की ओर से रेटिंग एजेंसियों के कामकाज पर विचार-विमर्श के पीछे मकसद यही था कि इससे हम उन गलतियों से बच सकेंगे, जो पश्चिमी देशों ने की है। लेकिन दिक्कत यह है कि बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों के नियमन से जुड़े कई मुद्दों पर उन देशों में ही कोई साफ विचार नहीं उभर सका है, जहां इनकी गड़बड़यिों की वजह से दुनिया को हिला देने वाले संकट पैदा हुए। फिलहाल कमेटी को देश में रेटिंग एजेंसियों के कामकाज के बारे में ऐसा कोई नुक्स नहीं दिखा, जिससे नियमन की किसी कड़ी प्रक्रिया के बारे में विचार किया जा सके। सबसे अच्छा तरीका यही है हमारी नियमन एजेंसियों को यहां के बाजार की जरूरत के हिसाब से ही कोई तरीका अपनाना चाहिए, जिनसे जरूरत हो तो रेटिंग एजेंसियों के कामकाज में पारदर्शिता की जांच की जा सके।





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