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बेहद मजबूत है ग्रामीण बाजार

देश में ग्रामीण बाजार लगता बढ़ता जा रहा है। देश के ग्रामीण इलाके में लगभग 80 करोड़ उपभोक्ता हैं। वर्ष 2004-05 में राष्ट्रीय आय में ग्रामीण क्षेत्र की भागीदारी 43 फीसदी थी। ग्रामीण इलाके की आय 220 अरब डॉलर आंकी गई थी। वर्ष 2010-11 तक इसके बढ़ कर 425 अरब डॉलर तक पहुंच जाने की उम्मीद है। हर साल इस बाजार में 12 फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है और देश की हर तरह की कंपनियों के लिए यह बहुत बड़ा बाजार साबित होने जा रहा है।



कृषि क्षेत्र के विस्तार और उत्पादन में वृद्धि से ग्रामीण इलाकों की आय में जबरदस्त इजाफा हुआ है। ऊंची दरों पर फसलों की खरीद ने ग्रामीण इलाके में रहने वाले लोगों की जेब में ज्यादा पैसा पहुंचाया है। नरेगा जैसे कार्यक्रमों से रोजगार में इजाफा हुआ है और ग्रामीण इलाकों में मजदूरी भी बढ़ी है। ग्रामीण बाजार को गति देने में ये वजहें अहम भूमिका निभा रही हैं। अगले कुछ साल तक ग्रामीण बाजार ऑटो, टेलीकॉम, वित्तीय उत्पाद और सेवा और एफएमसीजी सेक्टर से जुड़ी कंपनियां बड़े पैमाने पर इस बाजार में सक्रिय रहेंगी। इनके लिए यहां विकास की अपार संभावनाएं हैं। लेकिन सवाल यह है कि ग्रामीण बाजार की अपार संभावनाओं के बावजूद कुछ ही कंपनियां मौके को भुनाने में क्यों सफल रही हैं? ज्यादातर कंपनियों के इस दौड़ में पिछड़ने की कई वजहें हैं। हालांकि दो वजहें अहम हैं। पहली, ग्रामीण उपभोक्ताओं तक सीधी पहुंच में आने वाली लागत में इजाफा। दूसरी वजह है ग्रामीण बाजारों के मार्केटिंग ऑपरेशन पर नियंत्रण न होना। आखिर कुछ कंपनियों की लागत के बेकाबू होने की वजहें क्या हैं? विश्लेषकों के मुताबिक पर्याप्त उत्पादन न होने से कंपनियों की प्रति इकाई वितरण लागत बढ़ जाती है। ग्रामीण बाजारों का स्वरूप शहरी बाजारों से अलग होता है। गांवों में बाजार बिखरे हुए हैं और आबादी भी कम है।



प्रति व्यक्ति खर्च की दर भी कम है। साथ ही कई चीजों की मांग सीजन पर निर्भर है। कई कंपनियां इन इलाकों में सीधी मार्केटिंग करती है। ग्रामीण इलाकों में एफएमसीजी कंपनियों का डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क एक खास किस्म का है। कई इलाकों में कंपनी का एक सुपर-स्टॉकिस्ट है। कंपनी के कैरिंग और फारवर्डिग (सीएंडएफ) एजेंट और गांवों की खुदरा दुकानों के बीच कई सब-स्टॉकिस्ट होते हैं। कुछ एफएमसीजी कंपनियों ने डिस्ट्रीब्यूशन का नया मॉडल भी खड़ा किया है। अगर कंपनियों को ग्रामीण बाजार मेंअपनी पहुंच मजबूत करनी है तो उन्हें डिस्ट्रीब्यूशन के मोर्चे पर उन्हें नए सिरे से सोचना होगा। शहर के डिस्ट्रीब्यूटर, सुपर स्टॉकि स्ट और सब-स्टॉकिस्ट के पुनर्गठन के बाद उन्हें एक इकाई में तब्दील करना होगा। यानी एक ऐसा डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क जो सीधे खुदरा दुकानदारों तक पहुंच बना सके। अगले कुछ साल में ग्रामीण इलाकों में फोन की तादाद में भारी इजाफा होगा। टेलीफोन घनत्व में इजाफा होने के साथ ही फोन आधारित डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम मजबूत हो सकेगा। इससे सेल्समैन पर निर्भरता काफी हद तक कम हो जाएगी।





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