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दूसरी हरित क्रांति में देर क्यों

खाने-पीने की चीजों में महंगाई की दर अब 20 फीसदी से थोड़ी नीचे उतरती हुई दिख रही है लेकिन इसमें बहुत ज्यादा कमी के आसार बिल्कुल नहीं दिख रहे हैं। अगले दो साल के अलावा लंबी अवधि में भी खाद्य उत्पादन में कमी आने की आशंका बढ़ गई है। सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय में सचिव प्रणब सेन ने कहा है कि आंक़ड़े इस साल कृषि उत्पादकता में छह से सात फीसदी में गिरावट की ओर इशारा कर रहे हैं। देश के कई इलाकों में पड़े सूखे और बाढ़ की वजह से यह स्थिति पैदा हो सकती है।



कृषि विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों का कहना है कि खेती में लागत बढ़ने, बहुस्तरीय विपणन प्रणाली और सरकारी नीतियों की वजह लंबी अवधि में भी खाद्य उत्पादन को झटका लग सकता है। इन हालातों की वजह से आगे भी खाने-पीने की चीजों के दाम में ज्यादा नरमी देखने को नहीं मिलेगी। ऐसे में आयात पर देश की निर्भरता बनी रहेगी और आयात भी भारी मात्रा में करनी होगी। लेकिन दिक्कत यह है कि जनसंख्या बढ़ती जा रही है और खाद्यान्नों का उत्पादन घटता जा रहा है। कृषि नीति विश्लेषकों का कहना है कि किसानों पर बने राष्ट्रीय आयोग की सिफारिशों को लागू किए बिना देश में कृषि उत्पादन नहीं बढ़ सकता। ऐसा हो नहीं रहा है। इसलिए आने वाले कुछ साल में खाने-पीने की चीजों के दाम में बढ़ोतरी आपके जीवन का हिस्सा बनी रहेगी। लिहाजा भारत को उत्पादन बढ़ाना ही होगा। वरना उसे आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर रहना पड़ेगा। इस हिसाब से दुनिया के कमोडिटी बाजार में खाने-पीने की चीजों के दाम में बढ़ोतरी को रोकना मुश्किल होगा। यह भी संभव है कि अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजार में भारत से निक लने वाली मांग को पूरा करने की क्षमता ही न हो। खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने में बहुस्तरीय विपणन व्यवस्था भी काफी हद तक जिम्मेदार है।



खाद्यान्नों को खेत से उपभोक्ताओं तक पहुंचने में पांच हाथों से गुजरना होता है। अब जो हालात हैं, उसके हिसाब से भविष्य में खाद्यान्न के दामों में नरमी की संभावना बिल्कुल खत्म हो गई है। खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का तो यहां तक कहना है कि 2012 तक भारत खाद्यान्न के मामले में पूरी तरह आयात पर निर्भर हो जाएगा। शर्मा कहते हैं कि आयात से बचने के लिए ड्यूटी बढ़ानी होगी। किसानों की सीधी कीमत दी जाए और मिट्टी की सेहत सुधारी जाए। जिस तरह कृषि क्षेत्र की लगातार अनदेखी की जा रही है, उससे कृषि उत्पादकता में बढ़ोतरी की कोई संभावना नहीं दिखती। हालात तेजी से खराब हो रहे हैं। इस साल जीडीपी वृद्धि दर सात फीसदी से ज्यादा हो सकती थी लेकिन कृषि उत्पादकता में संभावित कमी से यह मंजिल दूर ही रहेगी। पिछले कई साल से देश के कृषि क्षेत्र में बेहतरी के लिए कोई व्यापक नीति नहीं लाई गई। अगर देश में खाद्य सुरक्षा को बरकरार रखना है तो सरकार को दूसरी हरित क्रांति के बारे में गंभीरता से सोचना होगा। वरना लोग थैलियों में पैसे लेकर जाएंगे और जेबों में राशन लेकर लौटेंगे।





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