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इन्फ्रास्ट्रक्चर की रफ्तार पर ब्रेक

वर्ष, 2004 में जब यूपीए की सरकार आई थी तब इसने इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को मजबूत करने का इरादा जताया था। सरकार ने सड़क, रेल और बंदरगाह परियोजनाओं पर खास ध्यान देने की बात कही थी। लेकिन पांच साल बाद यह देखना जरूरी है कि तीनों सेक्टर में कितनी तरक्की हुई है। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के साथ यूपीए सरकार को एनडीए सरकार की विरासत के तौर पर स्वर्णिम चतुभरुज जैसी सड़क परियोजना मिली थी। एनडीए सरकार के कार्यकाल में इसका तीन चौथाई काम पूरा हो गया था। लेकिन यूपीए सरकार की ओर से सड़क परियोजनाओं पर जोर देने के बाद भी एक चौथाई काम पूरा नहीं हो सका।

इसके अलावा पब्लिक -प्राइवेट पार्टनरशिप परियोजनाएं ठप पड़ी हैं। देश में 33000 किमी की नेशनल हाईवे डेवलपमेंट प्रोग्राम (एनएचडीपी) परियोजना रूकी हुई है। निवेशक इसमें पैसा नहीं लगा रहे हैं। राजमार्गो के निर्माण में सरकार 2012 तक लगभग तीन खरब रुपये खर्च करने जा रही है। पिछली बार यूपीए के सत्ता में आते ही इसने इन्फ्रास्ट्रक्टचर पर एक कमेटी की गठन किया था, जिसमें कई विभागों के मंत्रालय शामिल थे। अगले दो साल तक सरकार हवाई अड्डे, हाईवे और बंदरगाह परियोजनाओं पर लगातार काम करती रही। लेकिन इसके ठीक बाद ग्लोबल अर्थव्यवस्था में संकट का दौर शुरू हो गया और इससे निजी डेवलपरों को परियोजनाओं के लिए फंड उठाना मुश्किल हो गया। नेशनल हाईवे डेवलपमेंट प्रोग्राम की लगभग 47 परियोजनाएं अब भी अधूरी हैं। डेवलपरों के एक संगठन ने जनवरी, 2008 में राजमार्ग निविदाओं को चुनने के तरीके पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी थी।



मामला कोर्ट में होने की वजह से सड़क परियोजनाओं को पूरी करने की दिशा में अड़चन खड़ी हो गईं। जहां तक रेलवे का सवाल है तो भारतीय रेल ने वैगन से माल ढोने में लगभग दस फीसदी का इजाफा किया है। मालवाही भाड़ों से हासिल होने वाले राजस्व में इजाफा हुआ है। लेकिन रेलवे की कई परियोजनाएं लालफीताशाही में फंस गई हैं।केंद्र सरकार के 12 बंदरगाहों के जरिये ही निर्यात का पूरा कोराबार होता है। लेकिन इनमें निजी पूंजी निवेश को आकर्षित करने का काम आगे नहीं बढ़ रहा है। 2012 तक कागरे हैंडलिंग की क्षमता बढ़ाकर प्रति दिन 1.59 अरब टन करने की है। लेकिन अब भी भारतीय बंदरगाहों की हैंडलिंग क्षमता का 90 फीसदी ही इस्तेमाल हो रहा है। भले ही अभी निर्यात कारोबार में स्थायी विकास देखने को नहीं मिल रहा है लेकिन लेकि न जैसे-जैसे अमेरिका और यूरोप के बाजार में मांग पैदा होगी, वैसे-वैसे भारतीय निर्यात बाजार में भी सुधार दिखेगा।



इस लिहाज से बंदरगाहों की क्षमता में इजाफा जरूरी है। लेकिन इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में कई नीतिगत खामियों और फाइनेंस की कमी की वजह से यह परवान नहीं चढ़ पा रहा है। यूपीए सरकार के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है और इससे मुकाबले के लिए व्यापक और ठोस फैसले लेने की जरूरत है।





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