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दूसरी छमाही में घटेगी महंगाई

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दिसंबर, 2009 में थोक मूल्य सूचकांक 13 महीने के शिखर पर पहुंच गया। खाने-पीने की चीजों के दाम में भारी इजाफे ने थोक मूल्य सूचकांक को बेहद उछाल दे दी। सरकार के सामने खाने-पीने की चीजों के दाम काबू करने की बड़ी चुनौती है। रबी सीजन की अच्छी पैदावार के साथ-साथ कीमतों को काबू करने में उठाए जाने वाले सरकार के कदमों से अगले दो-तीन महीने में इसमें थोड़ी कमी दिख सकती है।



नवंबर, 2009 में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित पर वार्षिक महंगाई की दर 4.78 फीसदी थी लेकिन दिसंबर में यह बढ़ कर 7.31 फीसदी हो गई। नवंबर में सूचकांक 245.4 फीसदी पर था लेकिन दिसंबर में यह 0.45 फीसदी बढ़ कर 246.5 फीसदी पर पहुंच गया। नवंबर की तुलना में दिसंबर में प्राथमिक चीजों के दाम में 1.2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। मैन्यूफैक्चर्ड सामानों और ईंधन में क्रमश 0.2 और 0.1 फीसदी की बढ़त हुई। सबसे ज्यादा चिंता खाने-पीने की चीजों की कीमतों के बेकाबू होने को लेकर है। वार्षिक आधार पर खाद्य पदाथो के दाम में दशक की सबसे ज्यादा यानी 21.9 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई। एक महीने पहले यानी नवंबर में यह 21.9 फीसदी थी। मासिक आधार पर कुछ खाने-पीने की चीजों और कुछ मैन्यूफैक्चर्ड सामान की महंगाई में थोड़ी स्थिरता दिखी।



महंगाई को बढ़ाने में खाने-पीने की चीजों के दाम में इजाफे की सबसे बड़ी भूमिका रही है। इससे संपूर्ण महंगाई दर रिजर्व बैंक के दायरे से बाहर निकल गई। सरकार खुले बाजार में 20 से 30 लाख टन गेहूं और चावल रिलीज कर रही है। साथ ही जमाखोरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का फैसला किया गया है। चालू सीजन में रबी की बंपर पैदावार होने की उम्मीद है। इससे खाद्य वस्तुओं में नरमी आ सकती है। मार्च तक महंगाई दर घट कर 8-9 फीसदी के बीच आ जाएगी। दूसरी छमाही में महंगाई और कम हो जाएगी। मैक्रो और माइक्रो दोनों स्तरों पर अगर अर्थव्यवस्था के आंकड़ों का जायजा लें तो यह साफ हो जाएगा कि घरेलू अर्थव्यवस्था में रिकवरी के सबूत दिखने लगे हैं। जहां तक गैर खाद्य क्रेडिट में इजाफे का सवाल है कि इसने भी रफ्तार पकड़नी शुरू कर दी है। 2 जनवरी, 2010 तक इसमें 14.3 फीसदी का इजाफा हो चुका था।



महंगाई दर जिस तेजी से बढ़ रही है उससे लगता है रिजर्व जल्द ही अपनी मौद्रिक नीति कड़ी करने की घोषणा कर सकता है। 29 जनवरी को होने वाली मौद्रिक समीक्षा में सीआरआर में 50 बेसिस प्वाइंट को बढ़ोतरी की काफी संभावना है। रेपो और रिवर्स रेपो दरों में परिवर्तन की कोई खास संभावना नहीं दिखती। लेकिन इनमें 25 बेसिस प्वाइंट की सांकेतिक बढ़ोतरी से इनकार नहीं किया जा सकता। ब्याज दरों को लेकर अर्थशास्त्रियों का एक तबका सुरक्षात्मक रवैया अपनाए हुए है।



जबकि दूसरा वर्ग इसमें बढ़ोतरी की मांग कर रहा है। उनका कहना है कि ज्यादा मुद्रा प्रवाह अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है। महंगाई काबू करने के लिए मुद्रा प्रवाह पर रोक लगाने का समय आ गया है। ब्याज दरों को बढ़ाने के लेकर नीति-निर्माताओं के बीच कई दौर के विचार-विमर्श हुए हैं। लेकिन इसे लेकर वे एकमत नहीं हैं। सरकार के सलाहकार कई शीर्ष अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इकोनॉमी में रिकवरी स्ट्यिूमलस पैकेज की वजह से है। लिहाजा ब्याज दरें बढ़ाना ठीक नहीं रहेगा।





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