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जानवरों की आजादी का सवाल

पिछले दिनों मेरे कुछ मित्र उत्तराखंड घूमने गए थे। वे हरिद्वार, ऋषिकेश होकर जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क सफारी की मौज लेने के लिए पहुंचे। हरिद्वार में गंगा की कृत्रिम तेज धारा में घंटों डुबकियां लगाईं। यहां नहाना तो अपने आप में एक बड़ा सुख है। यहां का पानी इतना ठंढा है जो आपको बहुत सुकून देता है। आप हरिद्वार जाएं और शाम की आरती नहीं देखें तब समझिए कि आपने कुछ देखा ही नहीं। पानी में दिए और फूल गिरते-उतराते बहे जाते हैं। इस समय पूरा हरिद्वार सांझ की आरती देखने स्थिर हो गया लगता है। सचमुच यह दृश्य बहुत ही लोमहर्षक होता है। मेरे दोस्तों ने हरिद्वार के बाद ऋषिकेश में रिवर राफ्टिंग का भरपूर लुत्फ उठाया। सात लड़के इकट्ठे गए थे तो जो मन में आया उसे अंजाम दे डालते। पूरे एक सप्ताह का कार्यक्रम बनाया था। वे दूसरे दिन शाम में जिम कॉर्बेट पहुंचे। उन्होंने वहां एक रिसॉर्ट में डेरा डाला। दूसरे दिन सुबह दस बजे सुबह सफारी की मौज पर निकलने का कार्यक्रम बना। लेकिन यकायक वहां कानफोंडू तेज म्यूजिक चलने लगा। टेन,टन...रात की मटकी फोड़े... आदि एक के बाद एक हिट नंबर्स बजने लगे। चक्करदार लाइटों की तेज रोशनी में लोगों ने हो-हल्ला मचाना शुरू कर दिया। उनकी तेज आवाज से साफ-साफ लग रहा था कि वे पूरी तरह आउट हैं।



यानी ज्यादातर लोगों ने चढ़ा रखी। उत्सुकता जगी और चौकीदार से पूछताछ की तो पता चला कि यहां तो हर रात डिस्को होता है। खूब पीना और पिलाना चलता है। आप थोड़ा सुबह उन रिसॉर्ट के आगे-पीछे छानबीन करेंगे तो आपको कई ब्रांड की शराब की बोतलें भी थकी हुई और जगह-जगह से टूटी-फूटी नजर आएगी। यही आलम रिसॉर्ट के लांज या लॉबी में चाय या कॉफी की चुस्कियां लेते हुए लोगों का दिखता है। लेकिन सवाल यह है कि सैलानियों की आजादी का पार्क में रह रहे जानवरों की जीवन पर क्या असर पड़ता है? लेकिन इससे पहले सवाल यह उठता है कि आखिरकार, नेशनल पार्क किन उद्देश्यों को लेकर बनाए गए? इसका असर उनकी प्राकृतिक गतिविधियों पर साफ-साफ जाहिर होता है। सीधे तौर पर उनके प्रजनन क्षमता पर पड़तनेशनल पार्क को बनाने के पीछे यह उद्देश्य रखे गए थे कि विलुप्त हो रहे जानवरों को एक जगह रखकर शिकारी प्रवृतियों से उन्हें बचाया जा सके।



दूसरा लाभ यह हो सकेगा कि उनकी जनसंख्या में वृद्धि होगी। यह बात ठीक है कि जानवरों के शिकार में बहुत हद तक की कमी दर्ज की जा रही है। लेकिन यहां बने रिसॉर्ट और होटलों में देर रात के शोर-शराबों से जानवरों की आजादी में पड़ रहे खलल के बारे में स्थानीय प्रशासन कोई चिंता नहीं कर रहा है। दिक्कत तो यह है कि यहां हर रात्रि होने वाले डिस्को, पीने-पिलाने जैसी तमाम गतिविधियों के लिए इन होटल वालों के पास लाइसेंस हैं। अब सवाल यह है कि पर्यटन के धंधे में मुनाफे के नाम पर जानवरों की आजादी को ताक पर क्यों रख दिया गया? इससे यह साफ है कि राज्य और केंद्र सरकार विलुप्त होती जानवर की प्रजातियों को लेकर बहुत फ्रिकमंद नहीं है। अन्य मुद्दों की तरह इसे भी मुद्दा बनाए रखना चाहती है। उसका कोई हल नहीं चाहती है।





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