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जी हां, पैसे पर हम मरते हैं

पैसा-पैसा करती है.. तू पैसे पर क्यों मरती है। यह अक्षय कुमार की हालिया रिलीज फिल्म का चलताऊ गाना है लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। आप इसे इगनोर नहीं कर सकते, क्योंकि हम वाकई पैसे पर मरते हैं। उल्टी तरफ से नाक पकड़ते हुए कहें तो पैसे के लिए काम करते हैं। भारतीय हॉकी टीम का पैसे को लेकर दर्द पुराना है लेकिन वल्र्ड चैंपियनशिप से ठीक पहले दर्द गहरा हो गया। पैसे नहीं दिए तो नहीं खेलेंगे। शुक्र है विवाद निपट गया।



सत्य को धर्म का पर्याय मानकर तुलसीदास ने एक जगह कहा है- धरमु न दूसर सत्य समाना। वंचितों का सबसे बड़ा सत्य यह है उन्हें अपना हक हासिल करना है। अगर सत्य के रास्ते पर चलते हुए अपना वांछित हासिल करने की कोशिश की जाती है तो इसमें क्या हर्ज है। लिंकन ने बेटे के शिक्षक को लिखा था- मेरे बच्चे को विनम्रों के साथ विनम्रता और टेढ़ों के साथ टेढ़ेपन से पेश आना सिखाइए। धर्मवीर भारती ने लिखा- सत्य को उदात्त होने के साथ-साथ उद्धत भी होना चाहिए। कहने का मतलब यह है कि अनुकंपा के लिए न सही लेकिन अधिकार पाने के लिए सख्त रास्ता अख्तियार करना पड़े तो ऐसा करना चाहिए। घी जैसे मूल्यवान चीज के लिए अगर उंगली टेढ़ी करनी पड़ती है तो आपका हक भी इस बात की मांग करता है कि उसे हासिल करने के लिए उंगली टेढ़ी की जाए। जिस पीटी ऊषा का नाम याद करते-करते भारत की एक पीढ़ी जवान हो गई उन्हें भी रोना पड़ा। उन्हें उंगली टेढ़ी करनी नहीं आई।



दरअसल जाने-अनजाने उंगली को टेढ़ा कर घी निकालने का काम हर सेक्टर में होता है। इसकी ईमानदार कोशिश आपको भी करनी चाहिए। ट्रैफिक लाइट पर एक बच्ची को मैंने दस का नोट दिया तो उसने फटा कहकर लौटा दिया। मैंने दोबारा 5 का सिक्का दिया तो उसे रखते हुए पलटकर कहा- बाकी के 5 रुपये भी दे दो साब। पैसा-पैसा रटने की बजाय इस सिलसिले में ईमानदार कोशिश की जाए तो इसमें बुराई क्या है? हां, जैसा कि लिंकन ने कहा था- अपने आत्मसम्मान को गिरवी मत रखियेगा। ठ्ठ नीरज पांडेय





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