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सुप्रीम
कोर्ट ने कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं की ओबुलापुरम माइनिंग कंपनी (ओएमसी) के लौह अयस्क के खनन और परिवहन पर लगी पाबंदी हटाने से इंकार कर दिया है। साथ ही शीर्ष अदालत ने आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में होने वाले इस खनन मामले का एक महीने में फैसला हाईकोर्ट को देने को कहा है।
मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की पीठ ने कहा है कि ओएमसी के खनन कार्य जारी रखने पर सशर्त आदेश देने वाला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट इस मामले के सीमा विवाद के जटिल मुद्दों पर बेहतर फैसला दे सकता है। इसे देखते हुए राजनीतिक रूप से प्रभावशाली खनन उद्योगपति रेड्डी बंधुओं की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। शीर्ष अदालत ने दरअसल अपने 17 दिसंबर के निर्देश को ही विस्तारित किया है। इसके तहत कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश पर स्थगन दिया था जिसमें रेड्डी बंधुओं को खनन जारी रखने की अनुमति दी गई थी। हाईकोर्ट ने आंध्र प्रदेश सरकार का वह आदेश खारिज कर दिया था जिसके तहत पर्यावरण के लिए कथित रूप से नुकसानदेह खनन कार्य पर प्रतिबंध लगाया गया था।
चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने आंध्र प्रदेश सरकार की अपील पुन: हाईकोर्ट को वापस भेजते हुए कहा है कि वह जल्दी से फैसला ले। राज्य सरकार और ओएमसी ने इस आदेश पर रजामंदी जताई है। अब राज्य सरकार को हाईकोर्ट के सामने अपना जवाब एक हफ्ते के भीतर दायर करना होगा। इससे पहले ओएमसी की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने आरोप लगाया था कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) ने किसी अधिकार के बगैर इस क्षेत्र में खनन गतिविधि रोकने संबंधी अपनी रिपोर्ट सौंपी है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस क्षेत्र में जांच कराने का आदेश दिया था और रिपोर्ट आंध्र प्रदेश सरकार के आधार पर सौंपी गई जिसमें ओएमसी के खनन कार्य रोकने तथा खनिज पदाथरें के परिवहन पर रोक लगाई गई। पीठ ने माना कि ऐसा कोई आदेश नहीं दिया गया था और हाईकोर्ट के समक्ष सीईसी की रिपोर्ट पर आपत्ति के लिए अभियोजन पक्ष को अनुमति दे दी। सीईसी को भी मामला हाईकोर्ट में रखने की इजाजत मिल गई।