|
||||||||||
Drishtikon
Emotional Development Emotional Development चीनी
की बेलगाम हो रही कीमतों को काबू करने के लिए केंद्र सरकार को समस्या का स्थायी हल खोजना चाहिए। पिछले दो साल से देश में गन्ने के उत्पादन में कमी आई है। गन्ने के क्षेत्रफल में भारी कमी का प्रमुख कारण किसानों को फसल का वाजिब दाम न मिलना है। इसलिए सरकार को गन्ना किसानों को उचित प्रोत्साहन देना चाहिए। गन्ने का फसल चक्र तीन साल का होता है इसलिए चीनी की ऊंची कीमतों से हाल-फिलहाल उपभोक्ताओं को राहत मिलने के आसार कम ही हैं।
वर्ष 2007-08 में देश में चीनी का उत्पादन 263 लाख टन का हुआ था जबकि देश में चीनी की सालाना खपत मात्र 229-225 लाख टन की है। ऐसे में वर्ष 2008-09 पेराई सीजन में में ऐसा क्या हुआ कि चीनी का उत्पादन घटकर 150 लाख टन से भी कम रह गया। इसका प्रमुख कारण अन्य फसलों गेहूं, चावल आदि के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में उचित बढ़ोतरी होना था जबकि इसके अनुपात में गन्ने के दाम नहीं बढ़े जिसके कारण किसानों के लिए गन्ने की खेती घाटे का सौदा बन गई। देश में गन्ने का उत्पादन कम रहने के बावजूद भी सरकार उत्पादन का सही आकलन नहीं लगा पाई जिसके कारण कीमतों में बढ़ोतरी हुई। चालू पेराई सीजन में सरकार ने देश में चीनी के उत्पादन का अनुमान 160 लाख टन का लगाया है ऐसे में जरुरत की बाकि चीनी आयात ही करनी पड़ेगी।
जब हमें पहले ही पता है कि देश में चीनी का उत्पादन मांग के मुकाबले कम रहेगा तो क्यों नहीं सरकार ने समय रहते उचित कदम उठाया। जिसके कारण उपभोक्ताओं को चीनी की ऊंची कीमतों से दो-चार होना पड़ रहा है। पिछले साल फुटकर में 22-24 रुपये प्रति किलो बिकने वाली चीनी के दाम बढ़कर 44-45 रुपये प्रति किलो हो गये हैं। गन्ने के उत्पादन में कमी का एक अंतर तो आया है कि गन्ना किसानों को भुगतान में हर साल देरी करने वाली उत्तर प्रदेश की चीनी मिलें चालू पेराई सीजन में नगद भुगतान कर रही है।