साल 2009 की शुरूआत बेहद निराशाजनक हालात में हुई थी। विश्व अर्थव्यवस्था पर मंदी का साया था। नौकरियां जा रही थीं, लोग हताश हो रहे थे, कंपनियों का उत्पादन गिर रहा था, अर्थव्यवस्थाएं डूबने के कगार पर थीं। लेकिन जैसे-जैसे साल बीतता गया, हम हर अंदेशे को धता बताते गए। लोगों को एक बार फिर नौकरियां मिलने लगीं। आमदनी बढ़ी तो मांग भी बढ़ी। अर्थव्यवस्थाएं विकास की पटरी पर लौटने लगीं। और देखते ही देखते यह साल बेहतरीन रिकवरी का साल बना गया।
नए साल में बात नए दशक की। नया दशक अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों में बुनियादी बदलाव का दशक साबित होने जा रहा है। इसके चलते कमोबेश सभी क्षेत्रों के लिए खड़़ी होंगी नई चुनौतियां। लेकिन तकनीक के इस युग में जिस तेजी से नई तकनीक पुरानी पड़ती जा रही है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि पुराने ढांचे और पुरानी मान्यताएं टूटेंगी। उनके स्थान पर खड़ी होंगी कामयाबी की नई इमारतें जो पूरा करेंगी नये सपनों को। इससे हमारी जीवन शैली में भी बड़ा फर्क आएगा। आज हम चर्चा कर रहे हैं इसी बुनियादी परिवर्तन की, इन्हीं चुनौतियों की, और इन चुनौतियों के पार जीवन की।
शुरूआत खेती से। कैसी बिडंबना है कि एक तरफ लोग भुखमरी के शिकार हो रहे हैं तो दूसरी ओर भूख मिटाने वाले अनाज से ही हम अपनी गाड़ियों के लिए ईंधन बना रहे हैं। हमारी खेती या कृषि के सामने आज सबसे बड़ी समस्या पानी की है। नहरों में पानी तो है लेकिन उस पानी का मात्र 35 फीसदी हिस्सा सिंचाई में इस्तेमाल हो पा रहा है। बारिश की अनिश्चितता के कारण भूजल का प्रयोग बढ़ रहा है। पानी से हम फसल उगाते हैं और फिर उस फसल का इस्तेमाल खाने के अलावा दूसरे कार्यो में करते हैं। इस तरह हम एक दुष्चक्र में फंसते जा रहे हैं। शायद यह हमारे अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इस चुनौती का समाधान जल प्रबंधन में ही है।
खेती के बाद सबसे अहम मुद्दा है रोजगार, क्योंकि लोगों की आमदनी पर ही पूरी अर्थव्यवस्था टिकी होती है। जिस देश की आबादी में युवाओं का एक बड़ा हिस्सा हो, वहां तो यह और महत्वपूर्ण हो जाता है। अगले दशक में कम से कम 25 करोड़ युवा नौकरी के लिए तैयार होंगे। जाहिर है कि इतनी तादाद में नौकरियों का सृजन करना बेहद मुश्किल होगा। हमें विकास की वही रणनीति अपनानी होगी जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार मिल सके। इसका एक और समाधान यह है कि हम अपनी शिक्षा नीति को ज्यादा रोजगारपरक बनाएं। वह भी इस तरह से कि हमारे युवा इस ग्लोबल विलेज में कहीं भी काम करने के लायक हों।
नौकरियों की संख्या बढ़ेगी तो लोगों का आवागमन भी बढ़ेगा। सड़कों पर बढ़ता ट्रैफिक का बोझ, रोजाना नौकरी के लिए दो-दो तीन-तीन घंटे का सफर अब आम समस्या बनती जा रही है। भविष्य में यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। इसलिए हमें जल्द ही इसका समाधान तलाशना होगा। विकास को महानगरों से बाहर छोटे शहरों और गांवों तक ले जाना इसका एक स्थायी समाधान तो है ही। इस परेशानी का हल परिवहन की ऐसी व्यवस्था में ढूंढा जा सकता है जिससे सड़कों का बोझ कम हो। इससे ईंधन की समस्या भी सीमित होगी।
सड़कों पर रोजाना बढ़ते वाहनों के कारण ईंधन की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। अब हमें इस बात को समझने की जरूरत है कि ईंधन के रूप में हम जिन संसाधनों का अधिक से अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं वे सीमित हैं। आखिर धरती के गर्भ से हम कब तक कच्चा तेल निकाल पाएंगे। अच्छी बात यह है कि इसके समाधान की दिशा में प्रयास शुरू हो गए हैं। ऐसे वाहन दिखने लगे हैं जो कम ईंधन का इस्तेमाल करते हैं। तेल संकट को देखते हुए यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि जल्दी ही सड़कों पर बैटरी से चलने वाले वाहनों की भरमार होगी। क्रूड के साथ-साथ एक और संसाधन संकट अभी से नजर आने लगा है- कोयले का। हमारे लिए बिजली बनाने का यह सबसे बड़ा स्रोत है। इससे निपटने के लिए सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, नाभिकीय ऊर्जा की दिशा में काम हुए तो हैं लेकिन हमारी जरूरतों का छोटा हिस्सा ही इनसे मिल पा रहा है। यह दशक ऊर्जा के इन्हीं रूपों यानी ग्रीन एनर्जी का होगा।
बिजली बनाने के अलावा पवन का एक और इस्तेमाल है - संचार। जैसी कि हमने पहले चर्चा की, आने वाला समय तकनीकी उपलब्धियों वाला होगा। संचार क्षेत्र में यह तकनीकी क्रांति सबसे ज्यादा देखने को मिलेगी। हालांकि यह किसी संकट के समाधान के रूप में नहीं बल्कि हमारी जरूरतों के मुताबिक होगा। भारत में 3जी तकनीक आने में भले ही देर हो लेकिन दुनिया के कई देशों में यह छा गई है। इसके जरिए हम बहुत सारे काम मोबाइल पर ही निपटा सकते हैं।
वीडियो कान्फ्रेंसिंग जैसी सुविधा आज दफ्तरों में मौजूद है, लेकिन संभव है कि कल हम अपने ऑफिस का पूरा काम घर बैठे मोबाइल पर ही निपटा दें। हो सकता है कल को युवा मोबाइल पर ही अपने टीचर की लेक्चर सुन लें। अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों में भी कुछ बुनियादी बदलाव देखने को मिल सकते हैं। उपभोक्ताओं का जमाना होगा। बैंक हों या उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली दूसरी कंपनियां, सभी अपने उत्पादों को इस तरह से तैयार करेंगी कि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच बनाई जा सके। दूसरे शब्दों में कहें तो आने वाला दशक आपका होगा।