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बाजार तय करगा शिक्षा की दिशा

सरकार शिक्षा को लेकर काफी सजग है। दुनिया में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए शिक्षा एक ऐसा हथियार है, जो देश को सफलता की नई ऊंचाइयों पर पहुंचा सकती है। इस बात को सरकार भी संजीदगी से ले रही है। तभी तो आज शिक्षा में भी पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के जरिए देश के कोने-कोने में शिक्षा मुहैया कराए जाने पर उसका विशेष जोर है। यही नहीं, देश में अंतरराष्ट्रीय स्कूलों और यूनिवर्सिटी का भी जमावड़ा लगने लगा है। पर हम यहां बात कर रहे हैं दस साल बाद की। दस साल बाद की स्थिति को ध्यान में रखकर ही सरकार को शिक्षा के बारे में कदम उठाने चाहिए।

अगर तथ्यों को देखें तो इस समय हमारे देश की जनसंख्या में युवाओं की तादाद सबसे अधिक है। साफ है कि दस साल बाद रोजगार पाने वाले लोगों की भी लंबी-लंबी लाइनें होंगी। ऐसे में सरकार को शिक्षा का ऐसा प्रबंध करना चाहिए, जो इन युवाओं को उचित रोजगार मुहैया करा सके। दरअसल, इतनी बड़ी आबादी को रोजगार दिलाना सरकार के लिए आने वाले समय में टेढ़ी खीर होगी। हालांकि, बेहतर और सही दिशा में दी जाने वाली शिक्षा के जरिए यह आसान हो सकता है। इसमें सरकार को ऐसी शिक्षा प्रणाली अपनानी चाहिए जिससे युवा केवल अपने देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी मनचाही नौकरी पा सकें। वैसे भी आज ग्लोबल विलेज का बोलबाला है। जानकार भी इस बात के संकेत दे रहे हैं कि भविष्य में दुनिया अलग-अलग देशों का समावेश नहीं, बल्कि ग्लोबल विलेज के रूप में होगी।

वैसे, केंद्र ने भी शिक्षा के भविष्य को लेकर सोचना शुरू कर दिया है। हाल ही में मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि सरकार अंतरराष्ट्रीय स्कूलों और विश्वविद्यालयों के केंद्र देश में खोलेगी। साथ ही शिक्षा में विदेशी निवेश को भी बढ़ावा दिया जाएगा। साफ है कि आने वाले समय में ऐसे कोर्स पढ़ाए जाएंगे, जो लोगों को देश-विदेश दोनों में रोजगार दिला पाने में सक्षम होंगे। यही नहीं, शिक्षा के क्षेत्र में भी ढेरों रोजगार उपलब्ध होंगे। आज शिक्षा में तकनीक तेजी से हावी होती दिखाई दे रही है। जानकारों की माने तो वो दिन दूर नहीं जब स्कूल त्नवचरुअल स्कूलत्न में तब्दील हो जाएंगे।

आज भी कई स्कूल वचरुअल क्लास रूम को तवज्जो दे रहे हैं। उच्च शिक्षा और प्रोफेशन एजुकेशन में वीडियो क्लास रूम का भी जमाना आ गया है। इससे साफ होता है कि उच्च तकनीक शिक्षा में नए आयाम देखने को मिलेंगे। हालांकि, सरकार को अभी देश के एक बड़े तबके पर ध्यान देने की काफी आवश्यकता है। यह वो तबका है जो आज भी प्रतिदिन 20 रुपये में ही अपनी जरूरतों को पूरा कर रहा है। इस तबके के बच्चों की शिक्षा पूरी तरह से सरकारी स्कूलों और संस्थानों पर निर्भर है, लेकिन सरकार अब भी बेसिक शिक्षा के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में विफल मानी जा रही है। देश में बंद होने वाले सरकारी स्कूलों की संख्या इस बात की तस्दीक दे रही है। हाल का ही उदाहरण लें, कर्नाटक में 28 दिसंबर को 485 बेसिक सरकारी स्कूलों पर ताला लगा दिया गया।

वजह यह कि इन स्कूलों में छात्रों की संख्या 5 या 5 से भी कम थी। यही नहीं राज्य में 782 स्कूल ऐसे भी हैं, जिनमें विद्यार्थियों की संख्या महज 6 से 10 के बीच है। दरअसल, आरोप यह है कि ये स्कूल शिक्षा का उचित माहौल देने में असक्षम साबित हुए। कुछ जानकार शिक्षा में हो रहे इस निजीकरण को सही नहीं मानते हैं। शिक्षा के जानकार अनिल सद्गोपाल का कहना है कि सरकारी स्कूलों के बंद होने का सिलसिला 1999 में शुरू हो गया था, जब इंदौर में 30 सरकारी शालाओं पर ताला जड़ दिया गया था। इसके बाद दिल्ली नगर निगम ने भी कई स्कूलों को बंद कर दिया था। उनका मानना है कि आने वाले समय में शिक्षा का बाजारीकरण होगा। सरकारी स्कूल इतिहास के पन्नों में दब कर रह जाएंगे। बकौल सद्गोपाल, यह गलत है।

उनका मानना है कि शिक्षा में निजीकरण गरीब जनता को शिक्षा से दूर कर देगा क्योंकि वे निजी स्कूलों द्वारा मांगी जाने वाली फीस चुका नहीं पाएंगे। ऐसे में शिक्षा कॉरपोरेट घरानों की मोहताज हो सकती है। इस बात को सरकार को संजीदगी से लेना चाहिए। दरअसल, जो स्कूल बंद हुए हैं उनकी जमीनों को कई कॉरपोरेट घरानों को बेच दिया गया। इससे भले ही सरकार ने पैसा कमाया हो, लेकिन उसने एक बड़े तबके को शिक्षा से वंचित कर दिया। बस सरकार को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम कहीं पश्चिमी देशों के गुलाम बनकर न रह जाएं।pulak.b@businessbhaskar.net





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