13वें वित्त आयोग ने राज्यों को केंद्रीय करों में ज्यादा हिस्सेदारी देने की सिफारिश की है। साथ ही राज्यों को वित्तीय दृष्टि से मजबूत करने की सिफारिश भी की गई है। सूत्रों के मुताबिक आगामी बजट में इन सिफारिशों का असर दिखेगा। बुधवार को 13वें वित्त आयोग की सिफारिशें राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को सौंप दी र्गई। अब इन सिफारिशों को संसद के पटल पर अगले सत्र में रखा जाएगा।
सूत्रों के मुताबिक आयोग ने अपनी सिफारिशों में पब्लिक फंड के बेहतर प्रबंधन की बात भी कही है। बंटवारा योग्य केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी को तीन से पांच फीसदी तक बढ़ाने की सिफारिश की गई है। अगर राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों की हिस्सेदारी में तीन फीसदी बढ़ोतरी की गई तो केंद्रीय करों में उनकी हिस्सेदारी बढ़कर 33 फीसदी तक पहुंच जाएगी। पिछले पांच साल से राज्यों को केंद्रीय करों में औसतन 30 फीसदी हिस्सेदारी मिल रही है। सूत्रों के मुताबिक अभी केंद्र ने सालाना 6.50 लाख करोड़ रुपये के कर संग्रह का लक्ष्य रखा है। अगर तीन फीसदी बढ़ोतरी की सिफारिश मान ली गई तो राज्यों को 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये अधिक मिलेंगे। अगर इनकी हिस्सेदारी को पांच फीसदी बढ़ाने की सिफारिश मान ली गई तो राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को 30,000 से 35,000 करोड़ रुपये ज्यादा देने होंगे। इसको देखते हुए सरकार केंद्रीय योजनाओं में भी फंड कम करने के विकल्प पर विचार कर सकती है।
13वें वित्त आयोग के चेयरमैन विजय केलकर ने कहा, सिफारिशों में मैंने राज्यों की वित्तीय सेहत को मजबूत करने के लिए कहा है। सरकारी खजाने को दुरुस्त करने के लिए अगले पांच साल (2010-15) का रास्ता तैयार करके भी हमने दिया है।त्न उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में केंद्र और राज्यों के बीच कर बंटवारे तथा राज्यों को स्थानीय निकायों से ज्यादा कर सहयोग करने की बात भी कही गई है। रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा, त्नइसकी सिफारिशों को आने वाले बजट में देखा जा सकता है। हालांकि इसको स्वीकार करने की अपनी प्रक्रिया है जिसे पूरा करने के बाद ही बताया जा सकेगा कि इस रिपोर्ट में क्या है।सूत्रों के मुताबिक रिपोर्ट में दो खास सिफारिशें हैं जिनमें से एक तो यह है कि केंद्रीय पूल में राज्यों की हिस्सेदारी तीन फीसदी तक बढ़ा दी जाए। दूसरी सिफारिश में इसे पांच फीसदी तक बढ़ाने की बात कही गई है। अभी केंद्रीय पूल में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की हिस्सेदारी करीब 30 फीसदी है। अगर इसे तीन फीसदी बढ़ाया जाता है तो राज्यों को केंद्रीय पूल में से 33 फीसदी तक हिस्सेदारी मिलेगी। इससे राज्यों की वित्तीय स्थिति बेहतर होगी। इसके साथ ही एक दूसरी सिफारिश भी की गई है जिसमें राज्यों को केंद्रीय पूल से पांच फीसदी ज्यादा हिस्सेदारी देने को कहा गया है। हालांकि, इसको लागू करने के लिए केंद्रीय सहायता को कम करने की बात भी कही जा रही है।
देश में सरकारी खजाने को फिर से बढ़ाने की नौबत इसलिए आई है क्योंकि सरकार ने पिछले साल वित्तीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। असल में, ग्लोबल वित्तीय संकट से भारतीय अर्थव्यवस्था को अछूता रखने के लिए सरकार को अपनी हैसियत से ज्यादा आधिकारिक खर्च करना पड़ा है। सरकार द्वारा पेश किए गए राहत पैकेजों के कारण चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा बढ़कर जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का 6.8 फीसदी हो जाने का अनुमान है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह जीडीपी का 6.2 फीसदी ही था। यही कारण है कि सरकार इस बार एफआरबीएम की अनदेखी करने पर विवश हो गई। ध्यान रहे कि देश की वित्तीय सेहत को दुरुस्त रखने के लिए सरकार ने खुद ही एफआरबीएम के रूप में कुछ दिशा-निर्देश लागू किए हैं।