शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से रेलवे ने जन साधारण टिकट बुकिंग सेवक (जेटीबीएस) शुरू की थी। लेकिन रेलवे ने ऐसे कदम उठाए हैं, जिससे बेरोजगारों के पौकेट पर और भी ज्यादा भार पड़ेगा। रेलवे बोर्ड ने एक नया फरमान जारी किया है, जिसके मुताबिक बुकिंग सेवक बनने के लिए 10 हजार रुपये की रकम और ज्यादा चुकानी होगी। पहले 55,000 रुपये जमा करने की आवश्यकता थी। यह फैसला एक जनवरी, 2010 से प्रभावी होगा।
रेलवे बोर्ड के कॉमर्शियल सकरुलर संख्या 66 के मुताबिक अब बुकिंग सेवक के टिकट जारी करने वाले खाते में कम से कम 10 हजार रुपये का शेष होना आवश्यक है। यदि इससे ज्यादा रुपये होंगे, तभी वह टिकट जारी कर पाएगा। वर्ष 2006 के मध्य में जब यह योजना लागू की गई थी, तब इसके लिए 15000 रुपये की सिक्युरिटी डिपोजिट और 40000 रुपये की बैंक गारंटी जरूरी थी। इसके अलावा टिकट जारी करने के लिए कंप्यूटर टर्मिनल बनाने में भी सेवक को ही पूंजी लगानी पड़ेगी।
इस योजना को लागू हुए करीब तीन साल बीत चुके हैं, लेकिन इसे कोई खास रिस्पांस नहीं मिला है। रेलवे बोर्ड के मुताबिक अक्टूबर 2009 तक इस योजना के तहत महज 150 लोग ही जुड़े हैं। जबकि यह योजना जब लांच की गई थी, तो कहा गया था कि इससे शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा और हजारों लोग इससे जुड़ेंगे।
रेलवे सूत्रों का कहना है कि यह योजना जिनके लिए बनाई गई थी, उनके लिए तो मुफीद नहीं है। क्योंकि इसमें सेवक सिर्फ जनरल टिकट जारी कर सकता है और उसे प्रति टिकट मात्र एक रुपया का कमीशन मिलता है। छोटे कस्बों या शहरों में कोई सेवक 100 टिकट भी बेच ले तो उसे 100 रुपये का कमीशन मिलेगा जबकि उसका खर्च इससे ज्यादा है। सूत्रों का कहना है कि इसका उपयोग तो लुधियाना, जालंधर जैसे स्थानों पर हो रहा है जहां लाखों की संख्या में प्रवासी रहते हैं।
वे घर जाने के लिए जनरल टिकट खरीदते हैं। इन मजदूरों से सेवक रूपी दलाल पांच से दस रुपये ज्यादा वसूलते हैं। सूत्रों के मुताबिक वहां हर रोज एक सेवक हजारों टिकट बेच लेता है जिससे तगड़ी कमाई जो जाती है। लेकिन छोटे शहरों के बेरोजगार की लगी पूंजी का ब्याज भी नहीं निकल पाता।