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गन्ना मूल्य विवाद से चीनी उद्योग को भी लगेगा झटका

केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई गन्ना मूल्य की नई व्यवस्था फेयर एंड रिम्यूनेरेटिव प्राइस (एफआरपी) केवल किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि चीनी उद्योग के लिए भी संकट का सबब बन सकती है। यह विवाद देश के चीनी उद्योग के लिए दीर्घकालिक रूप से घातक साबित हो सकता है। खासतौर से पिछले कुछ बरसों में उत्तर भारत में चीनी उत्पादन की क्षमता में निवेश करने वाली कंपनियां इसकी चपेट में आ सकती हैं। इसकी वजह पिछले करीब चार साल में इन राज्यों में चीनी कंपनियों द्वारा बढ़ाई गई क्षमता के बेकार हो जाने की आशंका है। अभी भी कई समूह अपनी पेराई क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर रहे हैं। इसका कारण पिछले दो साल में गन्ना किसानों द्वारा क्षेत्रफल में लगातार कमी किया जाना रहा है।

यही वजह है कि केंद्र सरकार द्वारा लागू एफआरपी व्यवस्था को लेकर चीनी उद्योग भी बंट गया है। इसने उत्तर भारत के राज्यों में निजी चीनी उद्योग की चिंता काफी बढ़ी है। भले ही एक वर्ग एफआरपी को उद्योग की सेहत के लिए फायदेमंद मान रहा है, लेकिन पूरा उद्योग इसके पक्ष में नहीं है। उनको यह समझ में आ गया है कि 129.84 रुपये प्रति क्विंटल के एफआरपी पर उनको गन्ना मिलने वाला नहीं है। यही वजह है कि मंगलवार को दिल्ली में गन्ना मूल्य पर कृषि मंत्री शरद पवार की बैठक के नाकामयाब होने के बाद वह किसी नए मध्यस्थ की तलाश में जुट गए हैं। इस मुद्दे पर खुलकर बात करने से भी निजी चीनी कंपनियों के मालिक कतरा रहे हैं। त्नबिजनेस भास्करत्न के साथ बातचीत में उत्तर प्रदेश के एक बड़े चीनी समूह के प्रबंध निदेशक ने कहा कि हमारे पास सालाना पांच लाख टन चीनी बनाने की क्षमता है, लेकिन हम पिछले साल दो लाख टन चीनी भी नहीं बना सके। इसकी वजह गन्ने का न मिलना है। चालू साल में विवाद के चलते किसानों ने गन्ने की प्लांटिंग रोक दी है जो हमारे लिए घातक हो सकती है। ऐसे में हमारे निवेश पर रिटर्न कैसे मिलेगा, जबकि हम चीनी उद्योग पर अपने समूह का सबसे अधिक फोकस कर रहे हैं।

वहीं, उद्योग सूत्रों का कहना है कि चीनी मिलों को धीरे-धीरे बात समझ में आ रही है। यही वजह है कि गन्ना मूल्य के झंझट को लेकर वह राज्य सरकार का दरवाजा खटखटाने जा रही हैं। बुधवार को निजी चीनी मिलों की उत्तर प्रदेश सरकार के साथ इस विवाद को सुलझाने के लिए बैठक हो रही है। देश की कुल चीनी उत्पादन क्षमता करीब 290 लाख टन है। इसमें से करीब 75 लाख टन क्षमता उत्तर प्रदेश में है और इससे कुछ कम करीब 72 लाख टन की क्षमता महाराष्ट्र में है। बाकी राज्यों में कर्नाटक की क्षमता करीब 20 लाख टन, तमिलनाडु की क्षमता लगभग 18 लाख टन और आंध्र प्रदेश की क्षमता करीब दस लाख टन है। वर्ष 2004 में उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह सरकार द्वारा लाई गई प्रोत्साहन नीति के बाद राज्य में करीब 10,000 करोड़ रुपये का निवेश चीनी उत्पादन क्षमता स्थापित करने में हुआ था।

इस मुद्दे पर कर्नाटक के एक बड़े चीनी उद्योग समूह के पदाधिकारी का कहना है कि अगर गन्ना मूल्य की अनिश्चितता के चलते किसान दूसरी फसलों की ओर रुख कर लेते हैं तो इस निवेश का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। वहीं, उद्योग से लंबे समय तक जुड़े रहने वाले एक विशेषज्ञ का कहना है कि बजाज हिंदुस्थान और बलरामपुर चीनी मिल के बीच सौदेबाजी टूटने में एक बड़ा कारण आने वाले दिनों में गन्ना उपलब्धता को लेकर खड़ी हो रही अनिश्चितता भी रही है। इसके साथ ही उनका कहना है कि किसानों को दूसरी फसलों में बेहतर आय के विकल्प हासिल हो गए हैं। इसलिए यह जरूरी नहीं कि वह गन्ना मूल्य की अनिश्चितता के चलते इसकी फसल को प्राथमिकता दें। उत्तर प्रदेश के अलावा पिछले कुछ वषरें में पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में भी चीनी मिलों की नई क्षमता स्थापित करने में निवेश हुआ है।





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