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नक्सल पर नजरिया बदलें

कोबाड गांधी और छत्रधर महतो में क्या समानता है? एक के पास विदेश की ऊंची डिग्री है तो दूसरे के पास सिर्फ बारहवीं पास का सर्टिफिकेट। लेकिन दोनों एक ही धारा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। यह धारा इस देश में लाखों वंचितों, शोषितों और संसाधनहीन बना दिए गए लोगों का प्रतिनिधित्व करती है। हर रोज अपनी जमीन से बेदखल किए जा रहे आदिवासियों, दलितों और किसानों के अधिकारों की आवाज उठाने वाली इस धारा को आमफहम भाषा में नक्सलवाद के नाम से जाना जाता है। इसे अपनी राह से भटके हुए आंदोलन की संज्ञा दी जाती है। इसके औचित्य पर सवाल उठाए जाते हैं। कहा जाता है कि हिंसा के आधार पर कोई भी आंदोलन ज्यादा देर तक आगे नहीं बढ़ सकता। यह वंचितों के संघर्ष को बहुत दूर तक आगे नहीं ले जा सकता। अलग-अलग राज्यों की सरकारें इनके प्रतिनिधियों को जब-तब पकड़ कर अपनी पीठ ठोकती रहती हैं। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री नक्सलियों को आतंरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं।



लेकिन वे इन खतरों की वजहों को समझने की कोशिश नहीं करते। नक्सलियों के खिलाफ बड़े-बड़े ऑपरेशनों की योजना बनाने से पहले यह नहीं सोचा जाता कि आखिरकार देश के सुदूर इलाकों की बेचैनी क्या है? विकास के नाम पर संसाधनों की लूट से अगर असंतोष पनप रहा है तो उसके समान बंटवारे पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता। क्यों हमारी चॉकलेट के लिए एल्यूमीनियम की रैपर तैयार करने का लालच में कोई कंपनी उड़ीसा के आदिवासियों को उनकी जमीन से उखाड़ फेंकती है। क्या हम उन्हें अपने साथ लेकर चलने का साहस और दृष्टिकोण नहीं अपना सकते? यह बात बेहद सरल है। लेकिन हम इसे समझने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसा इसलिए है कि समाज का एक वर्ग पूरे देश के संसाधनों को अपने उपभोग का सामान बना देना चाहता है। उसे दूसरों की हिस्सेदारी बिल्कुल पसंद नहीं। नक्सलवाद की उलझी गुत्थी का सिरा इसी समझ से बंधा है। जरूरत है इसे खोल कर समझने की।





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