Drishtikon
Editorial Editorial तालिबान
के हमलावरों ने असंख्य रॉकेट दागे और दर्जनों लोगों को मौत की घाट उतार दिया लेकिन इसके बावजूद अफगानिस्तान के चुनाव की वैधता को लेकर उंगली नहीं उठाई जा सकती है। वर्ष 2004 में अफगानिस्तान में मतदान का प्रतिशत 70 प्रतिशत रहा था लेकिन इस बार यह गिरकर 40 से 50 प्रतिशत तक जा पहुंचा। लेकिन इन दोनों ही चुनाव से उत्साह और उम्मीदें जगती है। खासकर उन परिस्थितियों में जब देश में उपद्रव अपने चरम पर था।
देश की पस्त अर्थव्यवस्था और पिछले सरकार के निकम्मेपन को लेकर लोगों में घोर असंतोष व्याप्त था। लोगों में असुरक्षा की भावना घर कर गई थी। यह बात भी चिन्हित की जाने लायक है कि इतने बिगड़े हालात होने की वजह से चुनाव प्रक्रिया की गाड़ी को पटरी से उतर सकती थी, परंतु ऐसा संभव नहीं हो पाया। हालांकि अभी आधिकारिक तौर पर चुनाव के परिणामों की घोषणा नहीं की गई है। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई और उसके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी अब्दुला अब्दुला दोनों ही वर्तमान चुनाव में बाजी मारने का दावा कर रहे हैं। आने वाले दिनों में मतों की गिनती को लेकर आरोपों का सिलसिला चलेगा। हालांकि इसकी शुरुआत की जा चुकी है। कंधार प्रांत में मतदान की प्रक्रिया में धांधली करने का आरोप अब्दुला ने करजई पर लगाया है। किसको ताज पहनाया जाएगा इस बारे में अभी से कहना थोड़ी जल्दबाजी होगी।
इसकी पुष्टि मतों की गिनती के बाद ही हो सकती है कि देश का ताज किसके सिर होगा। कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में मतों की गिनती के रुझान को देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो रहा है कि दौड़ में कौन बाजी मार ले जाएगा। इन क्षेत्रों में दोबारा मतों की गिनती कराए जाने की संभावना है। इस बात का कोई मतलब नहीं है कि राष्ट्रपति के पद के लिए कौन चुना जाता है। इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला है। जो भी राष्ट्रपति पद के लिए चुना जाएगा उसके सामने कुछ बड़ी चुनौतियां होगी, जिनसे उन्हें पार पाने की कोशिश करनी होगी। उनके सामने देश की आंतरिक सुरक्षा, व्याप्त भ्रष्टाचार और नशीले पदाथरे के बड़े पैमाने पर उत्पादन और लोगों की सामाजिक व आर्थिक मोर्चे पर सुधार करने की चुनौतियां होगीं।