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Drishtikon
Editorial Editorial अफगानिस्तान
का स्वतंत्र चुनाव आयोग देश में चुनाव संपन्न होने पर मुदित है। आखिर अफगानिस्तान की धरती पर गोलियों,बमों, रॉकेट लांचरों और मशीनगनों की आवाज के बीच लोकतंत्र की आवाज भी मुखर होती जो दिख रही है। शुक्रवार को निर्वाचन आयोग ने तालिबान के हाथों शहीद हुए 11 कर्मचारियों की सूची जारी की। हालांकि यह भी जल्द पता चल जाएगा आयोग के इस आशावाद का क्या हश्र होता है। अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की कवायद सफल तभी मानी जाएगी, जब यह साबित हो जाएगा कि ज्यादा से ज्यादा लोग इसका हिस्सा बने हैं।
हालांकि इस देश में लोकतंत्र की इस कवायद का पहला इम्तहान होगा इसका नतीजा। क्या चुनाव नतीजों को करजाई के प्रतिद्वंद्वी स्वीकार करेंगे। करजाई दूसरी और अंतिम बार चुनाव मैदान में हैं। इस बार उन्हें प्रतिद्वंद्वियों से कड़ी चुनौती मिल रही है। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला अब्दुल्ला उनके लिए चिंता का सबब बने हुए हैं। अब्दुल्ला उत्तरी गठजोड़ के नेता अहमद शाह मसूद के करीबी और उनकी सरकार में विदेश मंत्री रहे हैं।
शुक्रवार को दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी जीत का दावा किया। लेकिन कुछ राजनयिक अफगानिस्तान के चुनाव की दिसंबर 2007 में हुए केन्याई चुनाव से तुलना कर रहे हैं। यह चुनाव बूथ लूट, मतगणना के पहले ही विजेता बन जाने और जातीय हिंसा का जबरदस्त गवाह बना था।
प्रतिद्वंद्वियों और कुछ पश्चिमी ताकतों को करजाई के हारने का शक है। उन्होंने पैसे के भूखे और क्रूर मुजाहिदीन ताकतों को साथ जोड़कर एक गठबंधन बनाने की कोशिश की है। इससे उनकी छवि को गहरा धक्का लगा है। करजाई के लिए अतीत के अत्याचारों को भुलाना आश्चर्यजनक लग रहा हैं। कुंदुज के कसाई अब्दुल रशीद दोस्तम का वापस आना करजाई की मेहरबानी से संभव हुआ। विवादास्पद सैनिक कमांडर अब्दुल फाहिम भी करजाई के हमसफर हैं।
बड़ा सवाल यह है कि क्या अफगानिस्तान का नया राष्ट्रपति बेहतर सरकार कायम कर पाएगा। आम अफगास्तिानी बेसिक सुविधाएं चाहता हैं। मसलन शिक्षा, बिजली और ट्रांसपोर्ट। हालांकि आठ साल के लोकतंत्र में अफगानिस्तान में काफी कम सुधार दिखा है। अफगानिस्तानी नागरिक ऐसी सरकार चाहता है, जो दक्षिण में चल रही लड़ाई का खात्मा कर सके। देश की संप्रभुता को बरकरार रखे और नाटो की अंतरराष्ट्रीय सेना पर निर्भरता कम हो सके। करजाई ने बेहतर भविष्य का आश्वासन दिया है लेकिन काफी कम लोगों को विश्वास है वह और उनका गठबंधन शायद ही अच्छी सरकार दे पाएगी। अफगानिस्तान में चालीस फीसदी मतदान का अनुमान लगाया जा रहा है लेकिन इसे अमेरिका का राजनीतिक हथकंडा मानने वाले तालिबान का कहना है सिर्फ दस फीसदी लोगों ने वोट दिए।
इन चुनावों के बारे में जो एक व्यक्ति बेहद सतर्क होकर बयान जारी कर रहा है वह है रिचर्ड होलब्रुक। होलब्रुक अफगानिस्तान और पाकिस्तान में बराक ओबामा के विशेष प्रतिनिधि हैं। चुनाव के दिन उन्हें मध्य काबुल में महिलाओं के लिए बने विशेष मतदान केंद्र पर देखा गया। वह व्यस्त नहीं लग रहे थे और न ही उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि दूरदराज के इलाकों में मतदाताओं को क्या दिक्कतें आ रही हैं। उत्तर में मध्यवर्गीय शहर मरकाजी में मतदाताओं का उत्साह देखते हुए तालिबानियों ने पांच पोलिंग स्टेशनों पर हमला किया और मतदान पत्र जला डाले और कुछ को नदियों में फेंक दिया।
अब सवाल यह है कि क्या लोगों ने कई इलाकों में इसलिए वोट नहीं डाले के वे डरे हुए थे या फिर वो वोट डालना ही नहीं चाहते थे। हालांकि हिंसा और आतंकवादी हमलों के बीच लोगों में लोकतंत्र की भूख साफ दिखती है। लेकिन चुनाव में भागीदारी को लेकर उनमें संशय है। सऊदी अरब में किंग फहद यूनिवर्सिटी में गणित के प्रोफेसर उमर सईद चुनाव में पर्यवेक्षक की भूमिका निभा रहे थे। वह मतदाताओं की तादाद देखकर बेहद निराश और भौचक थे। प्रांतीय शहरों में तो मतदाताओं की तादाद और भी कम थी।
संयुक्त राष्ट्र ने इन चुनावों के लिए काफी धन खर्च किया है। लेकिन लोगों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। एक और चुनाव पर्यवेक्षक ने मतदाताओं में चुनाव के प्रति एक दुराव देखा। उनका कहना था कि यह चुनाव नहीं मजाक था। राष्ट्रपति चुना जा चुका है। सबकुछ अमेरिका के हाथ में है। हालांकि तालिबान के अलावा कोई भी इन चुनावों को असफल करार नहीं देना चाहता। आखिरकार इसे ब्रसेल्स और वाशिंगटन का समर्थन जो हासिल है।