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तकरीबन तीन दशक तक सेवा देने वाले रूस निर्मित मिग-23 बीएन विमान शुक्रवार को यहां के सैन्य अड्डे में आयोजित एक समारोह के दौरान भारतीय वायुसेना से अलविदा कर दिए गए। वायुसेना की 221 स्क्वाड्रन आखिरी ऐसी यूनिट थी जिसके पास जमीनी हमले करने वाले ये विमान थे लेकिन उसे ऑपरेशन मेघदूत के दौरान गश्त करने के अलावा इन विमानों में कोई खास विशेषता नजर नहीं आई। इन विमानों की भूमिका वर्ष 1980 के मध्य में सियाचिन में ऑपरेशन मेघदूत के अलावा वर्ष 1999 के करगिल युद्ध में आकाश की निगरानी तक ही सीमित रही।
विंग कमांडर वाईजे जोशी और स्क्वॉड्रन लीडर टीआर साहू ने हलवारा एयरबेस पर मिग-23बीएन विमानों से अंतिम उड़ान भरी। इन त्नस्विंग-विंगत्न लड़ाकू विमानों को जनवरी 1981 में वायुसेना में शामिल किया गया था। इन्हें पाकिस्तान के आधुनिक एएफ-16 लड़ाकू विमानों से मुकाबला करने के लिए पूर्ववर्ती सोवियत संघ से खरीदा गया था।
इस मौके पर वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल फली होमी मेजर ने कहा कि वे इस विमान की विदाई के मौके पर गर्व और दुख दोनों महसूस कर रहे हैं। उन्होंने मिग-23बीएन विमान को दुनिया का सबसे शक्तिशाली एक इंजन वाला लड़ाकू विमान बताया। वायुसेना प्रमुख ने कहा कि इस विमान के कारण वायुसेना की क्षमताओं में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई थी। लुगोवाया में तैनात तत्कालीन विंग कमांडर फिलिप राजकुमार ने अप्रैल-मई 1979 के दौरान इन विमानों का मूल्यांकन किया था और जनवरी 1981 में इसे वायुसेना की 10 स्क्वाड्रन में शामिल किया था।